हमारे देश में जितने भी ऐतिहासिक व्यक्ति हुए हैं उन सभी में एक समानता मिलती है कि वे सभी जो भी योजना बनाते थे उनमें बहुत आगे तक की सोच हुआ करती थी। वे अपना जीवन चाहे कितने ही कष्टों के साथ जी लिया करते थे पर उनमें अगली पीढ़ी के लिये एक प्रगतिपूर्ण सामाजिक वातावरण बुन लेने की तीव्र ललक थी। हमें डाॅ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे चिंतक नेताओं की विरासत मिली है जिन्होंने शायद ही कभी खुद के बारे में सोचा हो। शासन और सत्ता को ये जैसे चाहते इस्तेमाल कर सकते थे पर उन्होंने दूसरा ही रास्ता चुना। क्योंकि उन्हें पता था कि हमारे देश में लोगो को केवल सही दिशा दिखा देने से काम नही चलेगा बल्कि उनके साथ खड़े होकर उनका नेतृत्व करने की जरूरत है। उन्हें अच्छी तरह पता था कि सत्ता का नशा कितना खतरनाक है। परन्तु, आज की परिस्थिति बिल्कुल उलट है। आज जिस प्रकार समाज के हर क्षेत्र में लोगों का बौद्धिक स्तर गिरता जा रहा है, उसे देखकर तो यह लगता है कि अगर हम अपने वर्तमान की ही रक्षा कर सकने में सफल हो जायें तो यही बहुत बड़ी बात है। अब सुखद भविष्य का सपना बिल्कुल छोड़ ही दीजिये क्योंकि अगर स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन नही आया तो हमारा भविष्य बद् से बद्तर होने वाला है।
आज हम अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के जिस रूप को देख रहे हैं, यह वो रूप बिल्कुल नही है जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी। हमारी राजनीतिक पार्टियों ने देश को अपनी अपनी स्टाइल में चला-चलाकर बहुत ज्यादा घिस दिया है। अभी भी कोई भी दल अपनी आदत से बाज नही आ रहा है और नित्य नयी संजीवनी लिये कोई नेता आपको समझाता मिल जायेगा कि ये हो जाये तो परिवर्तन आ जायेगा। ये जो भी सुझाव हमारे सामने आते हैं, वास्तव में उनपर अमल करने से पहले हमें अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुरूस्त करना होगा। आज हमारे देश की राजनीति में सभी दल कहीं न कहीं एक दूसरे के सहयोगी की तरह काम करने लगे हैं। इन सभी दलों ने हमारे सामने ऐसे हालात खडे़ कर दिये हैं कि चाहे हम इस दल को वोट दें या उस दल को, ले-देकर बात बराबर ही रहती है। इन सभी दलों के नेताओं को पूर्ण विश्वास है कि शासन और सत्ता की लगाम इन्ही लोगों के हाथों में घूमती रहेगी। उन सभी ने अपने-अपने गिरेबान में झांककर देख लिया है और वो जानते हैं कि आज अगर एक दल ने दूसरे का पर्दाफाश किया तो कल उसकी बारी होगी। आप खुद देखते हैं कि अगर एक दल किसी दूसरे पर कोई आरोप लगाता है तो सफाई आने के बजाय दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ता है। ऐसी दशा में आज सभी राजनीतिक पार्टियाँ हमारी पहुँच से दूर हो चुकी हैं। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने कभी सोचा होगा कि जो भारत के लोग अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनवायेंगे, उन्ही की कोई सुध नही लेगा।
आज अपने देश में हर चुनाव को लड़ने का एक रेट तय है। सभासद से लेकर सांसद तक का चुनाव लड़ने वाले हर व्यक्ति को अच्छी तरह पता होता है कि उसे पार्टी-टिकट खरीदने से लेकर चुनाव जीतने और और फिर पूरे कार्यकाल के दौरान पार्टी फंड के लिये कितना जुगाड़ना होगा। ये सारा धन जो भी चुनाव लड़ने और पार्टियों के भविष्य के चुनावों के लिये जुटाया जाता है, वो सब न जाने कितने वर्षों से हम चुकाते चले आ रहे हैं। ये सभी दल मौसेरे भाई बने हमें ठग रहे हैं और यदि कोई व्यक्ति इस सबके खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश भी करता है तो उसे ऐसे दबाया जाता है कि वो औरों के लिये मिसाल बन जाये। स्थिति की गंभीरता को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि आम नागरिक तो छोडि़ये अगर कोई संवैधानिक संस्था सरकार के फैसलों पर प्रश्नचिन्ह लगाये तो सरकार उनपर भी टिप्पणी करने में कोई संकोच नही कर रही है।
आज हमारी राजनीतिक पार्टियों की दूरदर्शिता विलुप्त हो रही है और ज्यादा से ज्यादा इतनी दूरदर्शिता देखने को मिल रही है कि वो किस प्रकार अपना कार्यकाल पूरा कर सकती हैं। इसका कारण है कि एक तो सत्ता के नशे और धन के लोभ ने हमारे नेताओं की चिन्तन शक्ति को क्षीण कर दिया है। और दूसरी ओर आज के राजनीतिक परिदृश्य में जहाँ चुनाव लड़ने के लिये जेब मोटी होना आवश्यक है, उस क्वालिटी के लोग विधायिका नहीं पहुच पा रहे हैं जिनकी हमें जरूरत है। एक ही व्यक्ति पर लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की कृपा के उदाहरण कम ही होते हैं। इसमें उनकी गलती नही है, वास्तव में घूम फिर के इसमें भी गलती हमारी ही है क्योंकि हमीं लोगों ने तो उन्हें चुना है। राजनीति में धनबल की ऐसी घुसपैठ से बिना कोई कठोर कदम उठाये मुक्ति नही मिल पायेगी। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि देशहित में सरकार की उच्चस्तरीय अति गोपनीय बैठकों का भी मुख्य मुद्दा यही रहता होगा कि अगर बहुमत सिद्ध करना पड़ा तो कितना लग जायेगा !
आज हम अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के जिस रूप को देख रहे हैं, यह वो रूप बिल्कुल नही है जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी। हमारी राजनीतिक पार्टियों ने देश को अपनी अपनी स्टाइल में चला-चलाकर बहुत ज्यादा घिस दिया है। अभी भी कोई भी दल अपनी आदत से बाज नही आ रहा है और नित्य नयी संजीवनी लिये कोई नेता आपको समझाता मिल जायेगा कि ये हो जाये तो परिवर्तन आ जायेगा। ये जो भी सुझाव हमारे सामने आते हैं, वास्तव में उनपर अमल करने से पहले हमें अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुरूस्त करना होगा। आज हमारे देश की राजनीति में सभी दल कहीं न कहीं एक दूसरे के सहयोगी की तरह काम करने लगे हैं। इन सभी दलों ने हमारे सामने ऐसे हालात खडे़ कर दिये हैं कि चाहे हम इस दल को वोट दें या उस दल को, ले-देकर बात बराबर ही रहती है। इन सभी दलों के नेताओं को पूर्ण विश्वास है कि शासन और सत्ता की लगाम इन्ही लोगों के हाथों में घूमती रहेगी। उन सभी ने अपने-अपने गिरेबान में झांककर देख लिया है और वो जानते हैं कि आज अगर एक दल ने दूसरे का पर्दाफाश किया तो कल उसकी बारी होगी। आप खुद देखते हैं कि अगर एक दल किसी दूसरे पर कोई आरोप लगाता है तो सफाई आने के बजाय दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ता है। ऐसी दशा में आज सभी राजनीतिक पार्टियाँ हमारी पहुँच से दूर हो चुकी हैं। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने कभी सोचा होगा कि जो भारत के लोग अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनवायेंगे, उन्ही की कोई सुध नही लेगा।
आज अपने देश में हर चुनाव को लड़ने का एक रेट तय है। सभासद से लेकर सांसद तक का चुनाव लड़ने वाले हर व्यक्ति को अच्छी तरह पता होता है कि उसे पार्टी-टिकट खरीदने से लेकर चुनाव जीतने और और फिर पूरे कार्यकाल के दौरान पार्टी फंड के लिये कितना जुगाड़ना होगा। ये सारा धन जो भी चुनाव लड़ने और पार्टियों के भविष्य के चुनावों के लिये जुटाया जाता है, वो सब न जाने कितने वर्षों से हम चुकाते चले आ रहे हैं। ये सभी दल मौसेरे भाई बने हमें ठग रहे हैं और यदि कोई व्यक्ति इस सबके खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश भी करता है तो उसे ऐसे दबाया जाता है कि वो औरों के लिये मिसाल बन जाये। स्थिति की गंभीरता को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि आम नागरिक तो छोडि़ये अगर कोई संवैधानिक संस्था सरकार के फैसलों पर प्रश्नचिन्ह लगाये तो सरकार उनपर भी टिप्पणी करने में कोई संकोच नही कर रही है।
आज हमारी राजनीतिक पार्टियों की दूरदर्शिता विलुप्त हो रही है और ज्यादा से ज्यादा इतनी दूरदर्शिता देखने को मिल रही है कि वो किस प्रकार अपना कार्यकाल पूरा कर सकती हैं। इसका कारण है कि एक तो सत्ता के नशे और धन के लोभ ने हमारे नेताओं की चिन्तन शक्ति को क्षीण कर दिया है। और दूसरी ओर आज के राजनीतिक परिदृश्य में जहाँ चुनाव लड़ने के लिये जेब मोटी होना आवश्यक है, उस क्वालिटी के लोग विधायिका नहीं पहुच पा रहे हैं जिनकी हमें जरूरत है। एक ही व्यक्ति पर लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की कृपा के उदाहरण कम ही होते हैं। इसमें उनकी गलती नही है, वास्तव में घूम फिर के इसमें भी गलती हमारी ही है क्योंकि हमीं लोगों ने तो उन्हें चुना है। राजनीति में धनबल की ऐसी घुसपैठ से बिना कोई कठोर कदम उठाये मुक्ति नही मिल पायेगी। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि देशहित में सरकार की उच्चस्तरीय अति गोपनीय बैठकों का भी मुख्य मुद्दा यही रहता होगा कि अगर बहुमत सिद्ध करना पड़ा तो कितना लग जायेगा !

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