Sunday, October 28, 2012

ईमानदार चिन्तन


आपके सामने है कि परिवर्तन का चक्र आज हमें किस नियति पर ले आया है। ’’आॅनेस्टी इज़ द बेस्ट पाॅलिसी’’ सूक्ति की हर प्रकार से धज्जियाँ उड़ रहीं हैं। आज ईमानदार बने रहने के लिये ठीक से अपने बैंक बैंलेंस और जमीन-जायदाद की पड़ताल करके, हमें देख लेना चाहिये कि घर से मजबूत हैं या नहीं। अब बिना धन के ईमानदारी ज्यादा दिन नहीं चलती। क्योकि अब स्थिति कुछ ऐसी है कि हर तरफ लूट मची है और आपके पास दो ही रास्ते हैं। एक रास्ता यह है कि आप भी लुटेरों की भीड़ में शामिल हो जाईये या तो नकारा कहलाये जाईये। यही सच है, और आप खुद देख लीजिये, आप में से कितने ही ईमानदार इधर-उधर लगे हुये हैं, कोई कहीं लोगों को भाषण दे रहा है और कोई कहीं आज के समाज के अनुकूल लोगों से भाषण सुन रहा है। भाषण देने वाले ईमानदार को पूर्ण गंभीरता से सुने जाने का नाटक चल रहा है जबकि भाषण सुनने वाला नकारा ईमानदार एक-एक बात का अक्षरशः पालन करने की योजना बना रहा है। दोनों ही स्थितियों का अभीष्ट नियत है, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। दिन के अंत में बस यही सवाल आकर खडा़ हो जाता है कि आज कितना कमाया?
      अपने देश में मुख्यतः तीन प्रकार के ईमानदार पाये जाते हैं। पहला वर्ग उन लोगों का है जिनकी ईमानदारी के किस्से हम लोग सुनते आ रहे हैं और इस वर्ग के अब चुनिंदा लोग ही बचे हैं। दूसरा वर्ग उस तरीके के ईमानदार लोगों का है जो यह ख्याल रखते हैं कि उनके भीतर की बेईमानी उनके ईमानदारी के चोगे को फाड़कर बाहर न आ जाये और नियंत्रित बेईमानी करके हमें धोखे में रखते हैं। इस वर्ग के लोग आज के समाज में बहुतायत में मौजूद हैं। तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो सर्वाधिक व्यावहारिक लोग हैं और ईमानदार दिखने के पचड़े में बिल्कुल नही पड़ते और न्यूज चैनलों, समाचार पत्रों, इत्यादि पर छाये रहते हैं। अपने देश की वर्तमान दशा और इस वर्ग के लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखते हुये ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमारा भविष्य इसी वर्ग के कंधो पर होगा।
चैपट राजाओं की इस अंधेर नगरी में दीपक जलाने का प्रयास पूरी तरह व्यर्थ है क्योंकि विकास का चक्रवात बेकाबू हो चुका है। खैर जो भी हो, अब हम निश्चित तौर पर एक विकसित राष्ट्र तो हो ही जायेंगे क्योंकि विकास में बाधक कहलाये जाने वाले लोग स्वप्रेरणा से अपना बलिदान देने को उत्सुक हैं। न जाने कितने ही लोग देश के विकास की विभिन्न भावी परियोजनाओं की भूमि पर भूखे पेट बैठे तपस्या कर रहे हैं। भगवान के घर देर है अंधेर नहीं, ईश्वर इन लोगों को जल्द ही खुद में विलीन करके मोक्ष की प्राप्ति करवायेगा। इस सम्बन्ध में मुझसे ज्यादा हमारे विकास के फरिश्ते आश्वस्त हैं। और ऐसा होना समय की माँग भी है क्योंकि जीवन के लिये नितान्त आवश्यक वस्तुओं जैसे आधुनिक वाहन, उपकरण, सौंदर्य प्रसाधन, विभिन्न प्रकार के शीतल पेय, सुन्दर भवनों, इत्यादि कई का सतत उत्पादन जारी है और यदि इनका समय से उपभोग न किया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था चरमरा नहीं जायेगी। गेंहूँ, चावल, दाल, सब्जी का क्या है, गलियों में मारी मारी फिरती हैं। अगर न भी मिलें तो कोई दिक्कत नहीं है, बाहर से इन्हें भी आयात कर लिया जायेगा। परन्तु कभी न भूलें कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण तो विकास ही है क्योंकि कुछ भी खरीदने के लिये धन चाहिये और ये धन तो विकास कार्यक्रमों से ही आना है।
हमारे देश के कुशल राजनेताओं पर आज अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है क्योंकि विकास योजनायें बनाने और पूरी करवाने के साथ साथ उन्हें ही आज देश को आर्थिक रूप से बलवान बनाने के लिये ओवरटाइम करना पड़ रहा है। आज वे कड़ी मेहनत से इन्हीं योजनाओं में से कुछ धन बचाकर उसे किसी कम्पनी में निवेश कर रहे हैं कि देश तरक्की कर सके। कुछ क्रांतिकारी नेता तो जरा भी संशय की स्थिति में खुद की ही कम्पनी बना रहे हैं कि देश को जरा भी नुकसान न हो। मैं तो कुछ ऐसे भी नेताओं को भी जान रहा हूँ जिन्हांेने अभी तक तय नहीं किया है कि अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई का किस क्षेत्र में निवेश करें और इसलिये उन्होंने धन को सुरक्षित स्थानों पर जमा कर रखा हुआ है। ऐसे कर्मठ राजनेताओं को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम !
मुझे लगता है कि अब एक नये टाइप का जनजागरण अभियान चलाया जाना चाहिये क्योंकि बहुत से लोग आज के प्रचलित सामाजिक दृष्टिकोण से भिन्न मत रखते हैं। ऐसे लोगों को समझाने की आवश्यकता है कि जीवन से भी ज्यादा धन आवश्यक है और धन कमाने की दौड़ में एक तो वे पहले ही पीछे रह गये हैं और यदि वे अब भी न चेते तो वे पीछे दौड़ती भीड़ द्वारा बेरहमी से कुचल दिये जायेंगे। वैसे समाज में हर वर्ग की अपनी अहम जरूरत होती है, तो ऐसे लोग आज के समाज के महापुरूषों की अनुकम्पा से प्रदान किये जाने वाले पदों को भी ग्रहण कर सकते हैं। आपने तो सुना ही है कि ’’कोई छोटा-बड़ा नही होता’’। और आजकल तो वाकई में कभी कोई छोटा, बड़ा हो भी नहीं सकता है, वे तो बस बड़े ही हैं जो और बड़े होते जा रहे हैं।
मैं पहले ही एक सूक्ति का वर्णन कर चुका हूँ और अन्त में मुझे एक अन्य सूक्ति का ख्याल आ रहा है कि ’’जो होता है, अच्छे के लिये होता है’’। सबकुछ सबके लिये तो अच्छा हो नहीं सकता इसलिये अब देखने वाली बात ये है कि क्या किसके लिये अच्छा सिद्ध होता है।

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