दिसम्बर, 1946
महात्मा गांधी तथा लाॅर्ड माउण्टबेटन के बीच संवाद-
माउण्टबेटन- गांधी जी, अब भारत को स्वतंत्रता मिलने वाली है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद आप भारत में सबसे पहला काम क्या करेंगे?
महात्मा- कलम की पहली नोंक से सबसे पहले मैं भारत के सभी पशु कत्लखाने बन्द करवा दूंगा।
माउण्टबेटन- पर गांधी जी, भारत में भुखमरी, गरीबी और सांप्रदायिकता जैसी न जाने और कितनी गंभीर समस्याएं हैं तो सबसे पहले ये कत्लखाने ही क्यों बन्द करवाने हैं?
महात्मा- देखो माउण्टबेटन, अगर तुम मुझसे आजादी और कत्लखानों की बंदी में से कोई एक चुनने का विकल्प दोगे तो भी मैं दूसरे को ही चुनूँगा।
माउण्टबेटन- तो क्या इससे भारत की सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा?
महात्मा- समाधान का रास्ता अवश्य खुल जायेगा।
महात्मा और माउण्टबेटन के बीच का उपरोक्त संवाद लंदन के कई अखबारों में भी प्रकाशित हुआ था। गांधी व्यक्ति नही विचार थे जो बेहद दूरदर्शी और भारत की आत्मा को करीब से समझने की योग्यता रखते थे। 30 जनवरी, 1948 को महात्मा की हत्या कर दी गयी जो आज हमारे बीच सिर्फ फोटुओं में जिन्दा हैं, विचार के स्तर पर उनका सम्पूर्ण दफन किया जा चुका है।
गौ-हत्या पर जिस तरह की छिछली, सतही, अप्रामाणिक और जल्दबाजी में दी गयी टिप्पणियां प्राप्त हो रही हैं वो सिर्फ यह साबित कर रही हैं कि इतने गम्भीर विषय पर भी हमारा शासक वर्ग हमें भ्रमित करके अपने तुच्छ स्वार्थ सिद्ध करने पर तुला हुआ है। संगठित गौ-हत्या का इतिहास बहुत पुराना न होकर महज सवा सौ साल पुराना है जिसकी कुछ जानकारी होना बहुत जरूरी है।
इतिहास
सन् 1757 में राॅबर्ट क्लाइव ने धोखे से बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर भारत में कम्पनी राज्य का बिगुल फूंका और कम्पनी की फौज ने बंगाल में अपनी छावनी स्थापित की। अंगेजी फौज के जवानों को उनका प्रिय भोजन प्रदान करने के लिये कलकत्ता में पहला पशु कत्लखाना खोला गया और भारत में संगठित पशु हत्या की नींव डाली गयी। इस घटना के बाद, भारत के अन्य क्षेत्रों में जैसे-जैसे कम्पनी का शासन फैलता गया, पशु कत्लखानों की संख्या में इजाफा होता गया। कलकत्ता, बैरकपुर, पटना, मेरठ, रूड़की, आदि स्थानों पर जोर-शोर से पशु हत्या शुरू हो गयी। गौरतलब है कि भारत के सभी प्रमुख पशु कत्लखाने, मिलिट्री कैन्टोनमेन्ट से सटे हुये हैं। इन कत्लखानों में सभी जाति-धर्मों के भारतीयों को काम करने के लिये रखा जाता था और यह सिलसिला सन् 1857 तक बिना किसी व्यवधान के चलता रहा।
भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम, 1857 का एक प्रमुख कारण, कारतूसों में गाय तथा सुअर की चर्बी का प्रयोग किया जाना था जिसका सभी जाति-धर्म के भारतीयों ने विरोध किया था। अंगेजो ने यह भी देखा था कि भारत को आजाद कराने के लिये हिन्दू तथा मुसलमान दोनों कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे थे जिनको काबू करने में अंग्रेजों के छक्के छूट गये थे। यही वह समय था जब हमारी आज की कई गम्भीर सामाजिक समस्याओं के जहरीले बीज बोये गये थे।
सन् 1870 में स्वामी दयानन्द सरस्वती नामक एक महापुरूष ने आर्य समाज की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य था कि ‘‘वेदों की ओर लौटो‘‘। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये स्वामी जी ने देश के नौजवानों को आर्य समाज के साथ जोड़ा और गौ-रक्षा का प्रण लिया। आर्य समाज ने भारत के करीब 7,32,000 गांवों में इन्हीं नौजवानों की मदद से गौ-रक्षा समितियाँ बनाईं। आर्य समाज द्वारा संचालित गौ-रक्षा आन्दोलन सन् 1894 में अपने उच्चतम शिखर पर था जिसमें सभी जाति-धर्मांे के लोग जुड़ने लगे थे। आन्दोलन की अप्रत्याशित सफलता को देखकर अंग्रेज घबरा गये और इसी प्रतिक्रिया में ब्रिटेन की महारानी ने तत्कालीन गवर्नर जनरल को विस्तृत पत्र लिखकर, आन्दोलन के दमन हेतु कुटिल सुझाव दिये। महारानी ने उक्त पत्र के माध्यम से तत्कालीन गवर्नर जनरल को आदेश दिया कि अब से भारत के सभी पशु कत्लखानों में सिर्फ मुस्लिमों को ही काम पर रखा जाये।
आपको जानकार हैरानी होगी कि सन् 1894 ही वह दुर्भाग्यशाली वर्ष है जब हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच प्रथम साम्प्रदायिक दंगा हुआ। सन् 1894 के पूर्व भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगे का कोई प्रमाण नही मिलता है। कत्लखानों में सिर्फ मुसलमानों को ही काम देने और हिन्दुओं के हृदय में मुसलमानों के प्रति जहर घोलकर, अंगे्रजों ने उक्त आन्दोलन विफल कर दिया और जानबूझकर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत का वातावरण तैयार कर दिया। बंगाल विभाजन और मुस्लिम लीग की स्थापना इसी श्रृंखला की कडि़याँ हैं जिसका परिणाम देश का बंटवारा है।
पशु हत्या से हानि
पशुओं की हत्या सीधे तौर पर प्रकृति से छेडछाड़ है और प्रकृति से छेडछाड़ हर हाल में मानव जीवन के लिये घातक है। यह सत्य है कि मानव जीवन का उदय मांसाहार से हुआ है परन्तु जैसे-जैसे मनुष्य सुसंस्कृत होता गया उसने भोजन के अन्य विकल्प खोज लिये। विश्व के विभिन्न प्रान्तों में सामाजिक उदय और सुसंस्कृति का आगमन अलग-अलग कालखण्डों में हुआ है और हो रहा और जब समाज पूर्ण विकसित हो जाता है, वह प्रकृति से कम से कम छेडछाड स्वीकार करता है। यह हमारे देश का गौरव है कि इतिहास के एक कालखण्ड में हमारा समाज पूर्णतया विकसित था और उस समय इस देश में माँस-भक्षण वर्जित नही था, अपितु लोगों ने स्वेच्छा से शाकाहार अपना लिया था। समय के साथ देश में विश्व की अन्य सभ्यताओं के लोगों का आगमन हुआ जिससे खानपान की विविधताओं का देश में पुनः फैलाव हो गया। कई स्थानों पर लोगों के पास मांसाहार के अतिरिक्त पेट भरने का कोई अन्य विकल्प भी नही है। परन्तु, वह समय अब दूर नही है जब खानपान की इन विविधताओं में से मांसाहार का पूरी तरह लोप हो जायेगा। विज्ञान से यह तथ्य प्रमाणित है मांसाहार ग्लोबल वार्मिंग के लिये बड़ा खतरा है और तभी विश्व के आज के विकसित देश शाकाहार का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं।
भ्रांतियाँ तथा उपसंहार
अपने छद्म स्वार्थों की पूर्ति के लिये देश के शासक वर्ग ने गौ-हत्या को वर्ग विभाजन का हतकंडा बना लिया है। शासक वर्ग को यह नही भूलना चाहिये कि भारत में सर्वाधिक पशु हत्या कोई हिन्दू या मुसलमान न करके, कत्लखानों के माध्यम से राज्य स्वयं कर रहा है। खाओ, पियो और मौज करो की विदेशी विचारधारा अपने देश में थोपी जा रही है जिसके तहत प्रकृति के ह्रास की कतई चिन्ता नही की जाती है। स्वामी विवेकानन्द जैसे योगियों द्वारा दिये गये बौद्धकाल के विवरण को कांट-छांट कर पेश किया जा रहा है जिससे लोगों में अनावश्यक भ्रम फैल रहा है। इन समाजविज्ञानियों की अधकचरी इतिहास की जानकारी लोगों को भटका रही है जो वैदिक काल और बौद्धकाल में भेद करने तक में असमर्थ हैं। हिन्दू और मुसलमानों को आपस में लड़ाते रहने की जो साजिश अंग्रेजों ने की थी, उसका पर्त-दर-पर्त पर्दाफाश करने के बजाये कुछ शक्तिशाली सत्ता-लोलुप लोग हमें बेकार की बहसों फंसाकर अपना उल्लू सीधा करते आये हैं, और यदि हम न चेते तो ये हमें ऐसे ही मूर्ख बनाते रहेंगे।
Great work
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