Monday, October 22, 2012

अर्थव्यवस्था की नींव



हम भारतवासी हैं। हम जानते हैं कि विश्व बहुत तेजी से बदल रहा है और हमने भी इन परिवर्तनों को स्वीकार कर लिया है। आज हमारे विश्व में विकास के पैमाने बहुत अधिक बदल चुके हैं। आज की इस बदलती दुनिया में सभी देशों को ऊर्जा की बहुत अधिक आवश्यकता है क्योंकि सभी देशोें की ऊर्जा पर निर्भरता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। हम देख सकते हैं कि हमें बिजली, पेट्रोल, खनिज़, आदि की कितनी ज्यादा आवश्यकता है और हम जरूरत के मुताबिक इनका प्रबन्ध नही कर पा रहे हैं। हम यह भी जानते हैं कि ऊर्जा के ये सभी श्रोत हमेशा के लिये नही हैं और निरन्तर उपयोग से ये धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। आज कुछ बड़े उद्योगपतियों के इशारों पर जिस प्रकार हमारे राजनेता इन प्राकृतिक ऊर्जा श्रोतों की नीलामी पर तुले हैं वह तो अलग से शोध का विषय है। परन्तु सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इस बदलाव के दौर में बहुत ज्यादा आगे बढ़ जाने के पहले हमें एक बार अपनी जड़ों में झांकने की आवश्यकता है।
हमारे पूर्वज इशारों-इशारों में हमें इतना कुछ सिखा गये हैं कि अगर हम उनकी सिखाई बातों को अपने जीवन में अपनायें तो हमारे उभरते हुये भारत को ऊर्जा की समस्या से कभी ग्रस्त नही होना पड़ेगा। हमारे पूर्वजों को नहीं पता था कि खेती में कीटनाशकों का क्या काम है पर वो केंचुओं को बेकार का जीव नहीं मानते थे। उन्हें नहीं पता था कि शरीर में ग्लूकोज़ की क्या जरूरत है पर वे नींबू और गुड़ का शर्बत पीने के शौकीन थे। वो कभी ’वर्क आउट‘ करने जिम नहीं जाते थे क्योंकि उन्हें सुबह उठकर दौड़ना और कसरत करना आता था। उन्हें तो कभी पंखे और ए.सी. की भी जरूरत नहीं लगी पर वो घरों में पेड़ और खिड़कियों को बडा आवश्यक समझते थे।
      प्रकृति सारी ऊर्जा की मालकिन है और हम जानते हैं कि ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट। हम केवल ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित कर सकते हैं पर हमें यह याद रखना चाहिये कि ये परिवर्तन किसी ऐसे रूप में न होता जाये जो चीजें हमारे लिये गैरसेहतमन्द हों। मगर जो हो रहा है वो बहुत बुरा है। पता नही ऐसा क्यों हो रहा है कि हम प्रकृति को भूलते हुये अधिक से अधिक ऊर्जा पर निर्भर होते चले जा रहे हैं। जबकि आप देख रहे हो कि बड़ी मात्रा में ऊर्जा उपभोग हमारे सामने इतनी गम्भीर समस्याएं लाकर खड़ा कर रहा है जिससे निपटना बहुत मुश्किल है।
आज कंक्रीट के जंगलों में हम बिल्कुल जानवरों की तरह स्वार्थी बनकर रह रहे हैं। हमें कोई मतलब नही हैं कि बगल का शहर या कस्बा किस समस्या से ग्रस्त है। चलिये मगर सौभाग्य से हमें यह तो चिन्ता है कि हमारी सन्तानें कैसे तरक्की करेंगी, पर उनके भी स्वस्थ भविष्य के विषय में कोई सोच ही नहीं रहा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि सब्सिडी क्या होती है और एक लीटर पेट्रोल खरीदने पर हमारे साथ-साथ देश पर कितना भार आता है। इन बातों को देश को समझाना बड़ा मुश्किल है इसलिये देश को सिर्फ यह याद दिलाना चाहिये कि ऊर्जा पर पूर्ण निर्भरता हमारी तासीर के विपरीत है। और अब हमें खुद सोचने के साथ-साथ अपने बच्चों को भी सिखाना चाहिये कि हम उस देश के वासी हैं जहाँ हमें केवल प्रकृति पर ही निर्भर होना सिखाया गया है। ठीक है कि बिजली और पेट्रोल हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक हो गये हैं पर अगर ये देश के लिये परेशानी का सबब बन रहे हैं तो वो आत्मविश्वास भी उतना ही आवश्यक है कि इनके बिना भी हम जी लेते हैं। फिर देखें हमारी अर्थव्यवस्था पर कौन ग्रहण लगाता है !

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