अपने देश की क्या दशा है अथवा हो गयी है, यह बात हमारे देश में हमेशा से राष्ट्रीय चिन्तन का केन्द्र रही है। चाहे वो सत्ता के गलियारे हों अथवा गली के नुक्कड़, सभी जगह लोग एक विशेषज्ञ की भाँति देश की वर्तमान दशा पर अपनी-अपनी टिप्पणियां देते हैं। ये केवल हमारे ही देश की विशेषता है कि हर समय देश के विभिन्न कोनों में तरह-तरह के लोग राष्ट्रचिन्तन में सदैव ही लगे रहते हैं। इतनी प्रचुर मात्रा में चिन्तकों की आबादी होने के बावजूद इस देश में किसी समस्या का कोई स्थायी निदान नही निकल पाता, इसकी कोई तो वजह होगी। मेरे मुताबिक निदान ढ़ूढ़ पाने में हम असमर्थ इसलिये दिखते हैं क्योंकि देश का सारा बौद्धिक तबका केवल देश की दशा सुधारने के लिये जद्दोजहद कर रहा है जो प्रयास नाकाफी मालूम पड़ रहे हैं। आज देश की दशा सुधारने की जो विचारधारा हर व्यक्ति के दिमाग में है वो खुद में ही पूर्ण नही है। मेरा मतलब है कि हम ये करके या वो करके सब कुछ ठीक कर लेगें अथवा सबकुछ ठीक कर लेने की ओर आगे बढ़ जायेंगे, ऐसी सोच से हमारा भला हो पाना बड़ा मुश्किल है।
आज देश की दशा सुधारने के लिये विकास योजनायें बनाने से पहले हमें एक सही दिशा की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। हमें वो दिशा खोजनी है जिसके पथ का अन्त विकास के चरम बिन्दु पर हो तथा जिसके दोनो ओर पूरा भारत खडा़ हो। आज हम चाहे जितने विशेषणों को विकास के साथ चिपकाकर नई-नई योजनाओं की चाशनी में भिगोकर लोगों के सामने पेश करें, वो वास्तव मे हमारे लिये कल्याणकारी नही हो सकता है। इन सारी योजनाओं को लेकर चाहे जितनी बातें हों पर ये हमारी आकांक्षाओं पर खरी नही उतर पाती हैं क्योकि इनका दायरा बहुत ही संकीर्ण होता है। किसी भी देश के विकास कार्यक्रमों की रूपरेखा में वहाँ की सरकार कुछ प्राथमिकतायें सुनिश्चित करती है कि हम इस प्रकार से सरकार चलायेंगे और इस प्रकार से देश को और ऊपर उठाने का प्रयास करेंगे। आज हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह हो गया है कि अब सरकार विभिन्न दलों के गठबंधन से बनती है और जिनकी पहली प्राथमिकता सरकार चलाने की होती है। अपनी यही प्राथमिकता पूरी करते-करते सरकार के पाँच वर्षों का समय गुज़र जाता है, पर बीच-बीच में माहौल बनाने के लिये हमारे सामनेे विकास का कोई न कोई नया शगूफा जरूर छोड़ दिया जाता है। यही हमारे विकास कार्यक्रमों के पीछे की कड़वी सच्चाई है।
अगर हम अपने को एक असली शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखना है तो हमें सुनिश्चित करना होगा कि अपनी विकासधारा की दिशा देश में भीतर की ओर हो। पहले हमें भीतर से ठोस होने की आवश्यकता है न कि बाहरी पाॅलिश की। हमें विकास के पूरे जत्थे को सबसे पहले अपने गांवो में लेकर जाना होगा और वहाँ से फिर से एक नयी शुरूआत करने का प्रयास प्रारम्भ करना होगा। हमारे किसान हमारे अन्नदाता है और केवल गांव की भूमि में ही मातृभूमि की असली महक बरकरार है इसलिये हमें इनके सम्मान के लिये आगे आना चाहिये। हमें हमारी फसल में बढ़ोत्तरी करने और किसानों में आत्मविश्वास भरने की आवश्यकता है। ऐसा करने के लिये किसानों का ऋण या ब्याज माफ करने के बजाय उन्हे आत्मनिर्भर बना सकने वाली योजनाओं की आवश्यकता है। इस काम को करने में हमें यह भी याद रखना होगा कि धीरे-धीरे कहीं ऐसी स्थिति न आ जाये कि हमारी आगे आने वाली पीढि़यां यूरिया को कोई प्राकृतिक तत्व ही मानने लगें।
आज हमारे नेता खुद को नीतिनिर्माता समझ रहे हैं और सिर्फ उस भारत के विकास की चिन्ता कर रहे हैं जो उनके आर्थिक खेलों को समझकर भी नासमझ बना रहता है। और कोई कुछ सुन और समझ न पाये इसलिये लगातार वैश्वीकरण का भोंपू बजाते रहते हैं। अभी हाल ही में जिस विदेशी निवेश को हमारे देश के कई बड़े नेता, किसानों के लिये औषधि के रूप में पेश कर रहे हैं और हमें समझा रहे हैं कि कैसे विदेशी कम्पनियाँ हमारे किसानों से सीधे फसल खरीदकर उन्हें अधिक मूल्य प्रदान करेंगी। मैं सरकार के तर्क पर एक छोटी सी बात यह कहना चाहता हूँ कि क्यों न विदेशी निवेश को देश में लाने से पहले हमारी सरकार पूरे देश की फसलों के निर्यात का अधिकार उन्ही किसानो के हाँथ में दे देती हैं। मेरे मुताबिक सरकार फालतू ही विदेशी निवेश के मुद्दे पर इतना उलझ रही है, किसानों को सीधा लाभ तो इस कदम से भी दिया जा सकता है।
आज हम जिस दिशाहीन विकासपथ पर घिसट रहे हैं, उसके पीछे कई तरह के तर्क दिये जाते हैं। हमें बताया जाता है कि आज विश्व क्या पूरा ब्रह्मांड ही तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव के साथ हमें भी लगातार बदलते रहना होगा। इस प्रकार का तर्क देने वाले लोग ये तथ्य क्यों याद नही रखते बदलाव के इस दौर में हम जिनसे प्रतियोगिता कर रहे हैं, वे देश अपनी अर्थव्यवस्था को बहुत पहले ही भीतर से ठोस बना चुके हैं। आज हमें सिखाया जा रहा है कि अगर आपके पास 2 लाख रूपये हैं और आपको 10 लाख की कार लेनी है तो तुरन्त लोन का आवेदन कर दो। ये विकास के अन्धे फरिश्ते भूल गये कि एक ठेठ भारतीय 10 लाख की कार के बारे में तो सोचता ही तब है जब उसके पास 20 लाख होते हैं। इसलिये अगर हम अपनी भारतीयता को भूलकर विकास को बाहर से भीतर की ओर ले जाने का प्रयास करेगें तो हम सफल नही हो पायेंगे। जिस प्रकार की नीतियों पर पिछले कुछ सालों से हमने चलना शुरू किया है उनने हमारी आत्मनिर्भरता पर चोट की है। पिछले कई सालों के उतार-चढ़ाव देखने के बाद, मुझे हमारी अर्थव्यवस्था खोखली नज़र आ रही है और खेती ही एकमात्र ऐसा विश्वसनीय तरीका दिख रहा है कि जिसको अगर हमने ताकत दे दी तो कोई हमारे आसपास भी नही टिक सकेगा। क्योंकि बन्दूक और पेट्रोल के बिना तो जीवन सम्भव है परन्तु भोजन के बिना नहीं। किसी की लिखीं दो पंक्तियाँ हैं -
जुनून का दौर है, किस-किस को जायें समझाने;
इधर भी अक्ल के दुश्मन, उधर भी दीवाने ।
आज देश की दशा सुधारने के लिये विकास योजनायें बनाने से पहले हमें एक सही दिशा की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। हमें वो दिशा खोजनी है जिसके पथ का अन्त विकास के चरम बिन्दु पर हो तथा जिसके दोनो ओर पूरा भारत खडा़ हो। आज हम चाहे जितने विशेषणों को विकास के साथ चिपकाकर नई-नई योजनाओं की चाशनी में भिगोकर लोगों के सामने पेश करें, वो वास्तव मे हमारे लिये कल्याणकारी नही हो सकता है। इन सारी योजनाओं को लेकर चाहे जितनी बातें हों पर ये हमारी आकांक्षाओं पर खरी नही उतर पाती हैं क्योकि इनका दायरा बहुत ही संकीर्ण होता है। किसी भी देश के विकास कार्यक्रमों की रूपरेखा में वहाँ की सरकार कुछ प्राथमिकतायें सुनिश्चित करती है कि हम इस प्रकार से सरकार चलायेंगे और इस प्रकार से देश को और ऊपर उठाने का प्रयास करेंगे। आज हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह हो गया है कि अब सरकार विभिन्न दलों के गठबंधन से बनती है और जिनकी पहली प्राथमिकता सरकार चलाने की होती है। अपनी यही प्राथमिकता पूरी करते-करते सरकार के पाँच वर्षों का समय गुज़र जाता है, पर बीच-बीच में माहौल बनाने के लिये हमारे सामनेे विकास का कोई न कोई नया शगूफा जरूर छोड़ दिया जाता है। यही हमारे विकास कार्यक्रमों के पीछे की कड़वी सच्चाई है।
अगर हम अपने को एक असली शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखना है तो हमें सुनिश्चित करना होगा कि अपनी विकासधारा की दिशा देश में भीतर की ओर हो। पहले हमें भीतर से ठोस होने की आवश्यकता है न कि बाहरी पाॅलिश की। हमें विकास के पूरे जत्थे को सबसे पहले अपने गांवो में लेकर जाना होगा और वहाँ से फिर से एक नयी शुरूआत करने का प्रयास प्रारम्भ करना होगा। हमारे किसान हमारे अन्नदाता है और केवल गांव की भूमि में ही मातृभूमि की असली महक बरकरार है इसलिये हमें इनके सम्मान के लिये आगे आना चाहिये। हमें हमारी फसल में बढ़ोत्तरी करने और किसानों में आत्मविश्वास भरने की आवश्यकता है। ऐसा करने के लिये किसानों का ऋण या ब्याज माफ करने के बजाय उन्हे आत्मनिर्भर बना सकने वाली योजनाओं की आवश्यकता है। इस काम को करने में हमें यह भी याद रखना होगा कि धीरे-धीरे कहीं ऐसी स्थिति न आ जाये कि हमारी आगे आने वाली पीढि़यां यूरिया को कोई प्राकृतिक तत्व ही मानने लगें।
आज हमारे नेता खुद को नीतिनिर्माता समझ रहे हैं और सिर्फ उस भारत के विकास की चिन्ता कर रहे हैं जो उनके आर्थिक खेलों को समझकर भी नासमझ बना रहता है। और कोई कुछ सुन और समझ न पाये इसलिये लगातार वैश्वीकरण का भोंपू बजाते रहते हैं। अभी हाल ही में जिस विदेशी निवेश को हमारे देश के कई बड़े नेता, किसानों के लिये औषधि के रूप में पेश कर रहे हैं और हमें समझा रहे हैं कि कैसे विदेशी कम्पनियाँ हमारे किसानों से सीधे फसल खरीदकर उन्हें अधिक मूल्य प्रदान करेंगी। मैं सरकार के तर्क पर एक छोटी सी बात यह कहना चाहता हूँ कि क्यों न विदेशी निवेश को देश में लाने से पहले हमारी सरकार पूरे देश की फसलों के निर्यात का अधिकार उन्ही किसानो के हाँथ में दे देती हैं। मेरे मुताबिक सरकार फालतू ही विदेशी निवेश के मुद्दे पर इतना उलझ रही है, किसानों को सीधा लाभ तो इस कदम से भी दिया जा सकता है।
आज हम जिस दिशाहीन विकासपथ पर घिसट रहे हैं, उसके पीछे कई तरह के तर्क दिये जाते हैं। हमें बताया जाता है कि आज विश्व क्या पूरा ब्रह्मांड ही तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव के साथ हमें भी लगातार बदलते रहना होगा। इस प्रकार का तर्क देने वाले लोग ये तथ्य क्यों याद नही रखते बदलाव के इस दौर में हम जिनसे प्रतियोगिता कर रहे हैं, वे देश अपनी अर्थव्यवस्था को बहुत पहले ही भीतर से ठोस बना चुके हैं। आज हमें सिखाया जा रहा है कि अगर आपके पास 2 लाख रूपये हैं और आपको 10 लाख की कार लेनी है तो तुरन्त लोन का आवेदन कर दो। ये विकास के अन्धे फरिश्ते भूल गये कि एक ठेठ भारतीय 10 लाख की कार के बारे में तो सोचता ही तब है जब उसके पास 20 लाख होते हैं। इसलिये अगर हम अपनी भारतीयता को भूलकर विकास को बाहर से भीतर की ओर ले जाने का प्रयास करेगें तो हम सफल नही हो पायेंगे। जिस प्रकार की नीतियों पर पिछले कुछ सालों से हमने चलना शुरू किया है उनने हमारी आत्मनिर्भरता पर चोट की है। पिछले कई सालों के उतार-चढ़ाव देखने के बाद, मुझे हमारी अर्थव्यवस्था खोखली नज़र आ रही है और खेती ही एकमात्र ऐसा विश्वसनीय तरीका दिख रहा है कि जिसको अगर हमने ताकत दे दी तो कोई हमारे आसपास भी नही टिक सकेगा। क्योंकि बन्दूक और पेट्रोल के बिना तो जीवन सम्भव है परन्तु भोजन के बिना नहीं। किसी की लिखीं दो पंक्तियाँ हैं -
जुनून का दौर है, किस-किस को जायें समझाने;
इधर भी अक्ल के दुश्मन, उधर भी दीवाने ।

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