जब भी अपने देश की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की खामियां हमारे सामने आती हैं तो कहा जाता है कि हमारा लोकतन्त्र अभी अपने शैशवकाल में है, लोकतन्त्र को अपने असल रूप में आने में समय लगता है। सभी यह भी कहते हैं कि कोई भी शासन प्रणाली, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली से बेहतर नहीं है एवं इसका कोई विकल्प भी मौजूद नहीं है। मैं इस तथ्य का प्रबल समर्थक हूँ कि किसी भी देश के नागरिकों को सही अर्थों में स्वतन्त्रता एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में ही मिल सकती है। परन्तु आज अपने लोकतन्त्र की जो कमियों उजागर हो रही हैं उसका कारण सिर्फ यह है कि जिस प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था को हमने अपनाया था, हम उस पर चल ही नही रहे हैं।
आज अपने देश में जिस प्रकार की सामाजिक असमानता फैलती जा रही है वह हमारे लोकतन्त्र के ऊपर एक प्रश्नचिन्ह तो लगाती ही है। अपने देश के लोगों ने जब खुद के लिये संविधान बनाकर इस लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को चुना था तो लक्ष्य यह था कि देश के अन्तिम व्यक्ति को उठाकर मुख्य धारा से जोड़ना है। क्या हम लोकतन्त्र के शैशवकाल की दुहाई देकर इस लक्ष्य की प्राप्ति में विफलता को भूल जायें ? किसी लोकतांत्रिक देश में नक्सली समस्या के लिये कोई जगह नहीं होती है और हमारा दुर्भाग्य देखिये कि हम इस समस्या का भी विकराल रूप देख रहे हैं। हम अपने लोकतन्त्र की विशेषताओं का जितना लाभ उठा सकते थे हमने उतना ही देशवासियों के साथ धोखा किया है। अब तो स्थिति ये है कि देश में एक ऐसा वातावरण तैयार हो गया है जो लोगों के बीच असमानता को तेजी से बढ़ा रहा है। आज हमारे नीति-नियन्ता इस देश का शासन जिस प्रकार से चला रहे हैं उसका भविष्य यही है कि धनी इतना धनी हो जाये कि देश की विकास दर के पीछे और सभी वर्ग बिल्कुल छिप जायें। हमारे पास जो वोट का हथियार है उसकी भी शक्ति समाप्त सी हो गयी है क्योंकि आज हमारे सामने कोई भी ऐसा विकल्प नही है जिससे हम कोई आशा कर सकें। किसी लोकतांत्रिक प्रणाली में राजनीति की ऐसी स्थिति की कोई कल्पना भी नही कर सकता है परन्तु आज यह कटु सत्य है।
इकोनाॅमिस्ट इन्टेलीजेंस यूनिट हर वर्ष वैश्विक लोकतन्त्र सूचकांक जारी करती है। इस सूचकांक में विभिन्न देशों की शासन प्रणाली को आंककर उन्हें पूर्ण लोकतन्त्र, दोषपूर्ण लोकतन्त्र, मिश्रित शासन तथा सत्तावादी प्रणाली की सूचियों में रखा जाता है। पिछले वर्ष के सूचकांक ने अपने देश में राजनीतिक भागीदारी, सरकारी कार्यप्रणाली और राजनीतिक संस्कृति की दशा को बेहद खराब बताते हुये देश के लोकतन्त्र को दोषपूर्ण लोकतन्त्र माना और विश्व में 39 वां स्थान दिया है।
आश्चर्य की बात यह है कि देश की राजनीति और प्रणाली में इतने दोष होने के बावजूद देश का गरीब वर्ग आज भी लोकतन्त्र का समर्थक है क्योंकि वह वास्तव में जानता है कि लोकतन्त्र का कोई विकल्प नहीं है। यह गरीब वर्ग इसी व्यवस्था पर निर्भर है और सुधार की आशा में है। जबकि देश के पूँजीपति वर्ग को अब इस व्यवस्था में व्यापार करने में आनन्द नही आ रहा है। वे जानते हैं कि अपने देश के लोकतन्त्र में जनहित, पँूजीपतियों के हित के ऊपर है। और मुझे लगता है कि जब तक हम इस लोकतन्त्र में जी रहे हैं देश का शासन सीधे पूँजीपतियों का हितसाधन नहीं कर पायेगा। अभी तक अपने देश के राजनीतिज्ञों ने देश में पँूजीपतियों को व्यापार करने में जो तरह-तरह कि सुविधायें दीं और दे रहे हैं उनमें कहीं न कहीं देश के गरीब वर्ग के उत्थान की भी बात करनी पड़ती है। परन्तु हमारे राजनीतिज्ञ इतने वर्षों में भी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि इन पूँजीपतियों में देश के विकास का रास्ता देखना सही नहीं है। मुझे तो ये लगता है कि वे जानबूझकर समझना ही नहीं चाहते हैं।
इन सब बातों को देखकर यह निष्कर्ष निकलता है कि लोकतन्त्र का विकल्प ढ़ूंढ़ने के बजाये हमें राजनीति का कोई ऐसा विकल्प ढूंढना होगा जिसके लिये हम सिर्फ संख्या न होकर भारत के लोग हों। हमारा लोकतन्त्र अब शैशवकाल में नही है बल्कि इतना आगे आ चुका है कि हमें खुद अपनी खामि़यां दिखला रहा है। मुहम्मद इकबाल ने भी क्या खूब कहा है-
‘‘जम्हूरियत वह तर्जे हुकूमत है जिसमें इन्सान की गिनती होती है, तौले नहीं जाते‘‘
आज अपने देश में जिस प्रकार की सामाजिक असमानता फैलती जा रही है वह हमारे लोकतन्त्र के ऊपर एक प्रश्नचिन्ह तो लगाती ही है। अपने देश के लोगों ने जब खुद के लिये संविधान बनाकर इस लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को चुना था तो लक्ष्य यह था कि देश के अन्तिम व्यक्ति को उठाकर मुख्य धारा से जोड़ना है। क्या हम लोकतन्त्र के शैशवकाल की दुहाई देकर इस लक्ष्य की प्राप्ति में विफलता को भूल जायें ? किसी लोकतांत्रिक देश में नक्सली समस्या के लिये कोई जगह नहीं होती है और हमारा दुर्भाग्य देखिये कि हम इस समस्या का भी विकराल रूप देख रहे हैं। हम अपने लोकतन्त्र की विशेषताओं का जितना लाभ उठा सकते थे हमने उतना ही देशवासियों के साथ धोखा किया है। अब तो स्थिति ये है कि देश में एक ऐसा वातावरण तैयार हो गया है जो लोगों के बीच असमानता को तेजी से बढ़ा रहा है। आज हमारे नीति-नियन्ता इस देश का शासन जिस प्रकार से चला रहे हैं उसका भविष्य यही है कि धनी इतना धनी हो जाये कि देश की विकास दर के पीछे और सभी वर्ग बिल्कुल छिप जायें। हमारे पास जो वोट का हथियार है उसकी भी शक्ति समाप्त सी हो गयी है क्योंकि आज हमारे सामने कोई भी ऐसा विकल्प नही है जिससे हम कोई आशा कर सकें। किसी लोकतांत्रिक प्रणाली में राजनीति की ऐसी स्थिति की कोई कल्पना भी नही कर सकता है परन्तु आज यह कटु सत्य है।
इकोनाॅमिस्ट इन्टेलीजेंस यूनिट हर वर्ष वैश्विक लोकतन्त्र सूचकांक जारी करती है। इस सूचकांक में विभिन्न देशों की शासन प्रणाली को आंककर उन्हें पूर्ण लोकतन्त्र, दोषपूर्ण लोकतन्त्र, मिश्रित शासन तथा सत्तावादी प्रणाली की सूचियों में रखा जाता है। पिछले वर्ष के सूचकांक ने अपने देश में राजनीतिक भागीदारी, सरकारी कार्यप्रणाली और राजनीतिक संस्कृति की दशा को बेहद खराब बताते हुये देश के लोकतन्त्र को दोषपूर्ण लोकतन्त्र माना और विश्व में 39 वां स्थान दिया है।
आश्चर्य की बात यह है कि देश की राजनीति और प्रणाली में इतने दोष होने के बावजूद देश का गरीब वर्ग आज भी लोकतन्त्र का समर्थक है क्योंकि वह वास्तव में जानता है कि लोकतन्त्र का कोई विकल्प नहीं है। यह गरीब वर्ग इसी व्यवस्था पर निर्भर है और सुधार की आशा में है। जबकि देश के पूँजीपति वर्ग को अब इस व्यवस्था में व्यापार करने में आनन्द नही आ रहा है। वे जानते हैं कि अपने देश के लोकतन्त्र में जनहित, पँूजीपतियों के हित के ऊपर है। और मुझे लगता है कि जब तक हम इस लोकतन्त्र में जी रहे हैं देश का शासन सीधे पूँजीपतियों का हितसाधन नहीं कर पायेगा। अभी तक अपने देश के राजनीतिज्ञों ने देश में पँूजीपतियों को व्यापार करने में जो तरह-तरह कि सुविधायें दीं और दे रहे हैं उनमें कहीं न कहीं देश के गरीब वर्ग के उत्थान की भी बात करनी पड़ती है। परन्तु हमारे राजनीतिज्ञ इतने वर्षों में भी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि इन पूँजीपतियों में देश के विकास का रास्ता देखना सही नहीं है। मुझे तो ये लगता है कि वे जानबूझकर समझना ही नहीं चाहते हैं।
इन सब बातों को देखकर यह निष्कर्ष निकलता है कि लोकतन्त्र का विकल्प ढ़ूंढ़ने के बजाये हमें राजनीति का कोई ऐसा विकल्प ढूंढना होगा जिसके लिये हम सिर्फ संख्या न होकर भारत के लोग हों। हमारा लोकतन्त्र अब शैशवकाल में नही है बल्कि इतना आगे आ चुका है कि हमें खुद अपनी खामि़यां दिखला रहा है। मुहम्मद इकबाल ने भी क्या खूब कहा है-
‘‘जम्हूरियत वह तर्जे हुकूमत है जिसमें इन्सान की गिनती होती है, तौले नहीं जाते‘‘

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