Friday, January 31, 2014

त्रिकोणीय सीरीज़ (चुनावी)

लोकसभा चुनाव नज़दीक हैं और ऐसे में सभी राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ना लाज़मी है। ये सभी दल जान रहे हैं कि अधिक से अधिक लोगों से मिलकर उनपर अपनी छाप छोडने के लिये बहुत कम वक्त बचा है। इस काम को करने के लिये मीडिया बहुत उपयोगी साधन है और इसीलिये राजनीतिक दलों द्वारा कई तरीके के राजनीतिक स्टंट करके मीडिया का जागृत रखा जा रहा है। कई सत्तारूढ़ छोटी और बड़ी पार्टियाँ लोगों की मेहनत की कमायी, अपने कामों के बख़ान और प्रचार में लुटा रही हैं। फिलहाल, मुख्य रूप से तीन दलों (कांगेस, बी.जे.पी और ..पी.) ने सबसे ज्यादा मीडिया कवरेज प्राप्त किया हुआ है। ये तीनों दल यथासम्भव प्रयास करके लोगों को अपने मोहपाश में बांधना चाहते हैं। इससे एक ऐसा राजनैतिक तिलिस्म उभर रहा है जिससे हम सभी भारत के लोग संशय की स्थिति में हैं।

कांग्रेस
देश में लोकतन्त्र की स्थापना के बाद से कई सरकारें बनाकर, सबसे अधिक समय के लिये सत्ता की बागडोर इसी दल के हाथों में रही है। अपनी आजादी से सम्बन्धित, हम जो भी इतिहास का पन्ना उठायेंगे उसमें कहीं कहीं कांग्रेस का जिक्र अवश्य मिलेगा। यह सही है कि कांग्रेस ने हमें जाने कितने बुद्धिजीवी दिये हैं जिनके अथक प्रयासों और दूरदर्शिता के कारण आज हम स्वतन्त्र हैं। परन्तु, जब यह दल उन पर अपना आधिपत्य ज़माता है तो उससे हमें खेद होना चाहिये। हम यह मानसिकता कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि यदि हम कांग्रेस को वोट नही देते तो हमारे मन में चाचा नेहरू के लिये सम्मान नही है। यह कैसे सही है कि यदि हम इंदिरा और राजीव की शहादत को सम्मान देना चाहते हैं तो हमें इसी दल को चुनना होगा। इस दल के आज के पुरोधा घुमावदार भाषा का प्रयोग करके हमें उसी मानसिकता की ओर खींचना चाहते हैं।
कांग्रेस के इन लगातार 10 वर्षों के शासन में हमने ढे़रों घटनायें देखी हैं और यह हमारा सौभाग्य है कि विकसित तकनीकि और उससे बढ़े सामाजिक सरोकार ने हमारी याददाश्त को तेज़ कर दिया है। अब हमारा देश सबकुछ भुलाकर वही घिसीपिटी सैद्धान्तिक और वैचारिक बातों में उलझने वाला नही है। यह देश कांग्रेस से पूँछ रहा है कि आपके दल के पास भारत के भविष्य से सम्बन्धित ठोस योजनायें हैं कि नहीं। और यदि हैं तो इन 10 वर्षों में इस दिशा में कौन-कौन से कदम बढ़ाये गये हैं। इस दल से विशेष तौर पर इसकी गलतियों का जवाब मांगा जायेगा क्योंकि हमने इनका चुनाव करते वक्त गलतियाँ करने की छूट नही दी थी। इन 10 वर्षों में संसद की मर्यादा नकारात्मक तौर पर प्रभावित हुई है और हम यह समझते हैं कि धुआं वही उठता है जहाँ आग होती है।

बी.जे.पी.
वैचारिक तौर पर इस दल की उत्पत्ति, कांगे्रस के एक छत्र राज के खिलाफ लामबन्द हुये महान नेताओं और फिर उनके उत्तराधिकारियों के बीच की आपसी फूट का फल मात्र है। भारतीय जनता पार्टी के उदय के बाद लोगों को एक मजबूत विकल्प प्राप्त हुआ जिससे संसद के भीतर एक स्वस्थ वातावरण बना था। हमारे देश की संसद में सदैव विपक्ष के कई विद्वान नेता मौजूद रहे हैं परन्तु लोकतन्त्र तो मोटे तौर पर संख्या का खेल है। बी.जे.पी. के जनाधार ने देश को लाभान्वित किया परन्तु जनाधार प्राप्त करने के लिये किये गये विशेष स्टंटों ने देश की नसों को प्रभावित किया है। हिन्दूवादी दल होने का दम्भ भरने वाला यह दल अपना जनाधार प्राप्त कर लेने के बाद आज काफी हद तक उस विचारधारा से अपनी दूरी बना रहा है। परन्तु इस दल को यह जवाब देना होगा कि इस पंथनिरपेक्ष देश की नसों में बहने वाली राम-रहीम की संस्कृति अब कैसे पुनसर््िथापित होगी। इस दल के कुछ क्रियाकलापों के कारण ही बहुत से दलों की धर्म आधारित राजनीति शुरू हुई है। बी.जे.पी. अगर अपनी हिन्दूवादी विचारधारा (जिसका विभिन्न तरीकों से बखान किया जाता है) को पूरी तरह छोड़ भी दे तो क्या उसकी लगायी राजनीतिक चिंगारी से विभिन्न राज्यों में भड़की आग कभी बुझ पायेगी।
इस बार के चुनाव में मुख्यतः कांगे्रस की नाकामियां ही बी.जे.पी. का ऐजेण्डा है। बी.जे.पी. के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार एक राजनैतिक स्टार हैं और गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर किये गये कामों के आधार पर वोट मांग रहे हैं। उनपर भी बी.जे.पी. की प्रधान विचारधारा से नजदीकी होने और उस आधार पर की गई कार्यवाहियों के गम्भीर दाग हैं। अगर एक पल के लिये उनके विकास माॅडल पर यकीन कर भी लिया जाये तो भी हमको यह नही भूलना है कि वे एक बहुसंख्यकवादी राजनैतिक दल के सिर्फ एक नेता मात्र हैं। हम सभी की कामना है कि उनके विकास के माॅडल झूठ निकलें और यदि वे सत्ता नही भी प्राप्त कर पाते हैं तो भी विपक्ष के रूप में इन बातों से देश का बहुत भला कर सकते हैं।

..पी.
यह दल शहरीकरण का एक प्रतीक है जिसका उभार सिर्फ इसी सदी में हो सकता था। एक मुददा (भ्रष्टाचार) जो लोगों के जीवन को कई स्तरों पर प्रभावित कर रहा है, को आधार बनाकर इस दल ने देश की राजधानी की सत्ता हासिल की है। हम जानते हैं कि अपने देश की राजधानी अन्य राज्यों की तुलना में काफी उन्नत है और सूचना तथा संचार की प्रगति ने इस दल को बड़ा लाभ दिया है। दिल्ली ने अपने भीतर हर राज्य के लोगों को समाहित किया हुआ है और इस दल को इसका लाभ भी मिल रहा है। दिल्ली में सरकार बनाने से इस दल को इतना मीडिया कवरेज़ मिला कि बहुत जल्दी पूरे देश में एक राजनैतिक दल के रूप में स्थापित हो गया है। इसमें कोई शक नही है कि इस दल ने राजनैतिक नैतिकता और शुचिता के प्रश्नों को चुनावी पटल पर ला दिया है जिस पर कोई भी दल चर्चा नही कर रहा था।
हमारे संविधान में किसी नेता के लिये कोई विशेष योग्यता या अनुभव का वर्णन नही है जिससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि संविधान ने लोगों के वोट को ही एक मात्र कसौटी माना है। इस प्रकार इस दल को अनुभवहीन होने के तर्क से खारिज नही किया जा सकता। अन्य दलों के मुताबिक ..पी. विचारधारा शून्य है और बिना विचारधारा के कोई भी दल अधिक समय तक जीवित नही रहता। इन सभी तर्कों के बावजूद यह दल अपना जनाधार बनाने में सफल है और इस बार के चुनाव में सभी दलों के बीच प्रतियोगिता का माहौल बनाये हुआ है।
..पी. ने लोकतन्त्र की परिभाषा का अक्षरशः प्रचार किया है जिससे लोगों को संविधान प्रदत्त शक्तिओं का ज्ञान हो रहा है। एक नया दल होने की वजह से ..पी. की समीक्षा करना मुश्किल है परन्तु, इस दल को अपने क्रियाकलापों में यह ध्यान रखना होगा कि संवैधानिक संस्थायें सर्वोपरि हैं और इनका कोई भी कृत्य इन संस्थाओं की गरिमा को प्रभावित करे।

चुनाव नजदीक हैं और हमको यह समझना है कि आज के समय में राजनैतिक विचारधारा का अर्थ आर्थिक विचारधारा से लगाया जाना चाहिये। हमने बहुत वक्त गुजार दिया पर देश के अन्तिम व्यक्ति के होंठो पर मुस्कुराहट नही ला पाये। आज की वैश्विक दुनिया में हमारी खूब भागीदारी हो चुकी है और अब इस वैश्विक अर्थव्यवस्था से ही देश की प्रगति का रास्ता खोज़ना है। प्रगति के पथ पर बढ़ते हुये देश की आत्मा को सुरक्षित रखना भी राजनैतिक दलों का कर्तव्य है। सिर्फ शहरीकरण को ही प्रगति नही समझना चाहिये।


चुनावी माहौल में राजनैतिक दलों के बीचआरोप-प्रत्यारोपका दौर गर्म है; ‘आरोप-स्पष्टीकरणके दौर के इन्तज़ार में............................................... मैं, आशुतोष शर्मा।

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