अपने देश के खुदरा उद्योग में विदेशी निवेश की अनुमति की अधिसूचना पारित होने के तुरन्त बाद देश में जिस प्रकार की आर्थिक बहस का माहौल बना है वो काबि़ल-ए-तारीफ है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जहाँ एक ओर संसद की कुर्सियां धूल खा रही हैं गनीमत है कि न्यूज़ चैनलों के बाहर नेताओं की कतारें हैं और वे अपने विवेकानुसार, हमें अपने-अपने पक्ष समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बहस में दो ध्रुव निकल कर सामने आये हैं, एक वर्ग सीधे किसानों को ढाल बनाकर विदेशी निवेश की आलोचना कर रहा है वहीं दूसरा वर्ग शहरी उपभोक्ताओं के आर्थिक लाभों को ध्यान में रखकर किसानों को उनकी फसलों का अधिक से अधिक मूल्य दिला देने हेतु विदेशी निवेश लाने पर तुला है। मेरे मुताबिक ऐसे क्लिष्ट विषय पर कोई नेता क्या किसी वरिष्ठ बुद्धिजीवी के लिये भी कोई सपाट राय कायम कर पाना सम्भव नहीं होगा। फिर भी, जैसे हमारे लिये लोकतन्त्र में वोट देना जरूरी है वैसे ही राष्ट्रहित के किसी मुद्दे पर अपनी राय बनाना भी हमारा कर्तव्य है।
एक भारतीय होने के नाते मेरी राय में भारत जिस प्रकार का देश है और भारतीय जिस प्रकार के लोग हैं, उनका अंतःकरण ऐसे विदेशी निवेश से कभी संतुष्ट नही हो सकेगा। हमने अपने भारत को एक समाजवादी (बल्कि गांधीवादी समाजवाद) देश के रूप में स्थापित किया था। समय-समय पर हमारे लोकतन्त्र के विभिन्न स्तम्भ हमें बताते रहते हैं कि उसी परिकल्पना पर हमारा राष्ट्र-निर्माण जारी है और जल्द ही हम सफल होने वाले हैं। हम सभी को याद रखना चाहिये कि हमारा नया भारत कितना ही आधुनिक क्यों न होता चला जाये, हमारा असली भारत जो हमारे गांवो में बसता है और खेती करता है वही हमारी नींव है। संसार को प्राकृतिक सम्पदायें बांटते समय प्रकृति हमसे कतई नाराज नहीं थी और इसलिये हम अगर अपने असली भारत को ईमानदारी से सशक्त करें तभी वह समग्र विकास हो सकता है जिसकी कामना में सब लगे हैं। देश को विकास के पथ पर दौड़ाने के लिये न तो हमें हथियार बनाने की जरूरत है और न ही आतंकवादी। हम खुद मेें एक उपमहाद्वीप हैं और अगर हम देश के सारे दरवाजे बन्द कर लें तो शायद हमें बाहर की किसी चीज की आवश्यकता न पड़े पर दुनिया अवश्य ही बौद्धिक तौर पर कमजो़र हो जायेगी। सन् 1992 में हमारे देश के एक कुशल वित्त मन्त्री ने देश की लचर अर्थव्यवस्था को संभालते हुये देश में जिस प्रकार का उदारीकरण लेकर आये उससे हमें वैसे लाभ तो कतई नही हुये जैसे उन्होंने वायदे किये थे। और तो और आज वही कुशल वित्त मन्त्री एक कमजोर और भ्रष्ट प्रधानमन्त्री के रूप में प्रसिद्धि पाने के साथ-साथ अपने पद पर विराजमान हैं। जिस प्रकार की पूँजीवादी नीतियाँ हमारे देश में लागू हो चुकी हैं या होने वाली हैं वे किसी भी रूप में असली भारत के हित में नही हैं। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश था, है और रहेगा।
इस विदेशी निवेश के अपने देश में आ जाने के बाद की परिस्थिति पर अगर उपरिवर्णित दोनों वर्गों के तर्कों की आप पड़ताल करें तो आप पायेंगे कि हर तर्क के जवाब में एक तर्क है। इन तर्कों के जवाबी हमलों का कोई अन्त भी नही दिख रहा है क्योंकि अपने देश के लिये खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश बिल्कुल नया विषय है और सभी लोग केवल आंकणों (जो अपने देश में सरकारी तथा गैरसरकारी दो विपरीत किस्म के होते हैं) अथवा आशंकाओं पर ही तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। इस विदेशी निवेश को सीधे किसानों से जोड़कर देखा जा रहा है जबकि अपने देश का विशाल उपभोक्ता वर्ग भी इसके दायरे में आने वाला है। ये उपभोक्ता वर्ग वही है जिसके लिये आज का वैश्विक बाजार पहले तो तरह-तरह की बीमारियां बनाता है फिर उनका समाधान बेचता है। वास्तव में धीरे-धीरे यह स्थिति आ गयी है कि अब इसी बाजार पर हमारी पूरी दिनचर्या निर्भर होती जा रही है। और अब अगर ऐसे बाजार को अपने देश में व्यापार की खुली छूट मिली तो न जाने यह हमें कौन-कौन सी आदतें डलवा देगा।
आज का भारत विश्व पटल पर और किसी रूप में जाना जाये अथवा नहीं, एक बड़ा बाजा़र तो जरूर दिखता है। हर कोई इस बाजार का लाभ उठाने की जुगत में है। जब किसी विदेशी कम्पनी को हमारे देश में निवेश की अनुमति मिलती है तो सरकारें हमें यही समझाने में लग जाती हैं यह निवेश सिर्फ और सिर्फ हमारी बेहतरी और खुशहाली के लिये है। खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश पर भी हमें समझाया जा रहा है कि इससे हमारे किसानों को उनकी फसल की अधिक कीमत मिलेगी, उपभोक्ताओं को खुदरा सामान कम दामों में मिलेगा और लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा। मुझे बस एक प्रश्न का उत्तर चाहिये कि गांधी और नेहरू की विरासत वाले इस देश में आज तक किसानों के जीवन-स्तर पर कोई विशेष बेहतरी देखने को क्यों नही मिली जबकि देश का किसान ही देश की विकास योजनाओं के केन्द्र में था। आज हमारा राष्ट्र विदेशी मुनाफाखोरों से अपेक्षा कर रहा है कि वे किसानों की सोचेंगे जो केवल अधिक से अधिक लाभ कमाने की नीति पर चलते हैं। भाई लोग कह रहे हैं कि एक बार विदेशी निवेश आने तो दीजिये, उसकी अच्छाई-बुराई खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी, इसे एक मौका तो मिलना ही चाहिये। मुझे ऐसे विचारों पर भी कठोर आपत्ति है क्योंकि नम्बर एक हम एक देश हैं, कोई प्रयोगशाला नही और नम्बर दो अंग्रेजो की गुलामी की नींव चार-पाँच व्यवसायिओं ने ही आकर रखी थी और यहाँ तो कम्पनियाँ पूरे ताने-बाने के साथ आने वाली हैं।
हमारे देश को पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की चकाचैंध से हमेशा बचकर चलना होगा क्योंकि अगर सब कुछ अच्छा भी हुआ तो भी यह केवल शहरी भारत को ही लाभ दे पायेगी। यदि शहरी भारत का विकास होगा तो असली भारत पिछड़ेगा और इससे एक ही भारत में दो विपरीत भारत बन जायेगें और ऐसी स्थिति संभाले नही संभलेगी। आज वैसे ही अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती चली जा रही है उसपर कोई पुल बनाने के बजाये इस प्रकार के विदेशी निवेश से भगवान जाने कौन सा लाभ होने वाला है। खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश पर एक टिप्पणी अपने असली भारत से भी-
’’ ई सब पंचै हमरा का भला करिहैं, बनिया तो ससुर आपन बाप का भी नही होता’’
एक भारतीय होने के नाते मेरी राय में भारत जिस प्रकार का देश है और भारतीय जिस प्रकार के लोग हैं, उनका अंतःकरण ऐसे विदेशी निवेश से कभी संतुष्ट नही हो सकेगा। हमने अपने भारत को एक समाजवादी (बल्कि गांधीवादी समाजवाद) देश के रूप में स्थापित किया था। समय-समय पर हमारे लोकतन्त्र के विभिन्न स्तम्भ हमें बताते रहते हैं कि उसी परिकल्पना पर हमारा राष्ट्र-निर्माण जारी है और जल्द ही हम सफल होने वाले हैं। हम सभी को याद रखना चाहिये कि हमारा नया भारत कितना ही आधुनिक क्यों न होता चला जाये, हमारा असली भारत जो हमारे गांवो में बसता है और खेती करता है वही हमारी नींव है। संसार को प्राकृतिक सम्पदायें बांटते समय प्रकृति हमसे कतई नाराज नहीं थी और इसलिये हम अगर अपने असली भारत को ईमानदारी से सशक्त करें तभी वह समग्र विकास हो सकता है जिसकी कामना में सब लगे हैं। देश को विकास के पथ पर दौड़ाने के लिये न तो हमें हथियार बनाने की जरूरत है और न ही आतंकवादी। हम खुद मेें एक उपमहाद्वीप हैं और अगर हम देश के सारे दरवाजे बन्द कर लें तो शायद हमें बाहर की किसी चीज की आवश्यकता न पड़े पर दुनिया अवश्य ही बौद्धिक तौर पर कमजो़र हो जायेगी। सन् 1992 में हमारे देश के एक कुशल वित्त मन्त्री ने देश की लचर अर्थव्यवस्था को संभालते हुये देश में जिस प्रकार का उदारीकरण लेकर आये उससे हमें वैसे लाभ तो कतई नही हुये जैसे उन्होंने वायदे किये थे। और तो और आज वही कुशल वित्त मन्त्री एक कमजोर और भ्रष्ट प्रधानमन्त्री के रूप में प्रसिद्धि पाने के साथ-साथ अपने पद पर विराजमान हैं। जिस प्रकार की पूँजीवादी नीतियाँ हमारे देश में लागू हो चुकी हैं या होने वाली हैं वे किसी भी रूप में असली भारत के हित में नही हैं। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश था, है और रहेगा।
इस विदेशी निवेश के अपने देश में आ जाने के बाद की परिस्थिति पर अगर उपरिवर्णित दोनों वर्गों के तर्कों की आप पड़ताल करें तो आप पायेंगे कि हर तर्क के जवाब में एक तर्क है। इन तर्कों के जवाबी हमलों का कोई अन्त भी नही दिख रहा है क्योंकि अपने देश के लिये खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश बिल्कुल नया विषय है और सभी लोग केवल आंकणों (जो अपने देश में सरकारी तथा गैरसरकारी दो विपरीत किस्म के होते हैं) अथवा आशंकाओं पर ही तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। इस विदेशी निवेश को सीधे किसानों से जोड़कर देखा जा रहा है जबकि अपने देश का विशाल उपभोक्ता वर्ग भी इसके दायरे में आने वाला है। ये उपभोक्ता वर्ग वही है जिसके लिये आज का वैश्विक बाजार पहले तो तरह-तरह की बीमारियां बनाता है फिर उनका समाधान बेचता है। वास्तव में धीरे-धीरे यह स्थिति आ गयी है कि अब इसी बाजार पर हमारी पूरी दिनचर्या निर्भर होती जा रही है। और अब अगर ऐसे बाजार को अपने देश में व्यापार की खुली छूट मिली तो न जाने यह हमें कौन-कौन सी आदतें डलवा देगा।
आज का भारत विश्व पटल पर और किसी रूप में जाना जाये अथवा नहीं, एक बड़ा बाजा़र तो जरूर दिखता है। हर कोई इस बाजार का लाभ उठाने की जुगत में है। जब किसी विदेशी कम्पनी को हमारे देश में निवेश की अनुमति मिलती है तो सरकारें हमें यही समझाने में लग जाती हैं यह निवेश सिर्फ और सिर्फ हमारी बेहतरी और खुशहाली के लिये है। खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश पर भी हमें समझाया जा रहा है कि इससे हमारे किसानों को उनकी फसल की अधिक कीमत मिलेगी, उपभोक्ताओं को खुदरा सामान कम दामों में मिलेगा और लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा। मुझे बस एक प्रश्न का उत्तर चाहिये कि गांधी और नेहरू की विरासत वाले इस देश में आज तक किसानों के जीवन-स्तर पर कोई विशेष बेहतरी देखने को क्यों नही मिली जबकि देश का किसान ही देश की विकास योजनाओं के केन्द्र में था। आज हमारा राष्ट्र विदेशी मुनाफाखोरों से अपेक्षा कर रहा है कि वे किसानों की सोचेंगे जो केवल अधिक से अधिक लाभ कमाने की नीति पर चलते हैं। भाई लोग कह रहे हैं कि एक बार विदेशी निवेश आने तो दीजिये, उसकी अच्छाई-बुराई खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी, इसे एक मौका तो मिलना ही चाहिये। मुझे ऐसे विचारों पर भी कठोर आपत्ति है क्योंकि नम्बर एक हम एक देश हैं, कोई प्रयोगशाला नही और नम्बर दो अंग्रेजो की गुलामी की नींव चार-पाँच व्यवसायिओं ने ही आकर रखी थी और यहाँ तो कम्पनियाँ पूरे ताने-बाने के साथ आने वाली हैं।
हमारे देश को पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की चकाचैंध से हमेशा बचकर चलना होगा क्योंकि अगर सब कुछ अच्छा भी हुआ तो भी यह केवल शहरी भारत को ही लाभ दे पायेगी। यदि शहरी भारत का विकास होगा तो असली भारत पिछड़ेगा और इससे एक ही भारत में दो विपरीत भारत बन जायेगें और ऐसी स्थिति संभाले नही संभलेगी। आज वैसे ही अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती चली जा रही है उसपर कोई पुल बनाने के बजाये इस प्रकार के विदेशी निवेश से भगवान जाने कौन सा लाभ होने वाला है। खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश पर एक टिप्पणी अपने असली भारत से भी-
’’ ई सब पंचै हमरा का भला करिहैं, बनिया तो ससुर आपन बाप का भी नही होता’’

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