आपके सामने है कि परिवर्तन का चक्र आज हमें किस नियति पर ले आया है। ’’आॅनेस्टी इज़ द बेस्ट पाॅलिसी’’ सूक्ति की हर प्रकार से धज्जियाँ उड़ रहीं हैं। आज ईमानदार बने रहने के लिये ठीक से अपने बैंक बैंलेंस और जमीन-जायदाद की पड़ताल करके, हमें देख लेना चाहिये कि घर से मजबूत हैं या नहीं। अब बिना धन के ईमानदारी ज्यादा दिन नहीं चलती। क्योकि अब स्थिति कुछ ऐसी है कि हर तरफ लूट मची है और आपके पास दो ही रास्ते हैं। एक रास्ता यह है कि आप भी लुटेरों की भीड़ में शामिल हो जाईये या तो नकारा कहलाये जाईये। यही सच है, और आप खुद देख लीजिये, आप में से कितने ही ईमानदार इधर-उधर लगे हुये हैं, कोई कहीं लोगों को भाषण दे रहा है और कोई कहीं आज के समाज के अनुकूल लोगों से भाषण सुन रहा है। भाषण देने वाले ईमानदार को पूर्ण गंभीरता से सुने जाने का नाटक चल रहा है जबकि भाषण सुनने वाला नकारा ईमानदार एक-एक बात का अक्षरशः पालन करने की योजना बना रहा है। दोनों ही स्थितियों का अभीष्ट नियत है, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। दिन के अंत में बस यही सवाल आकर खडा़ हो जाता है कि आज कितना कमाया?
अपने देश में मुख्यतः तीन प्रकार के ईमानदार पाये जाते हैं। पहला वर्ग उन लोगों का है जिनकी ईमानदारी के किस्से हम लोग सुनते आ रहे हैं और इस वर्ग के अब चुनिंदा लोग ही बचे हैं। दूसरा वर्ग उस तरीके के ईमानदार लोगों का है जो यह ख्याल रखते हैं कि उनके भीतर की बेईमानी उनके ईमानदारी के चोगे को फाड़कर बाहर न आ जाये और नियंत्रित बेईमानी करके हमें धोखे में रखते हैं। इस वर्ग के लोग आज के समाज में बहुतायत में मौजूद हैं। तीसरा वर्ग उन लोगों का है जो सर्वाधिक व्यावहारिक लोग हैं और ईमानदार दिखने के पचड़े में बिल्कुल नही पड़ते और न्यूज चैनलों, समाचार पत्रों, इत्यादि पर छाये रहते हैं। अपने देश की वर्तमान दशा और इस वर्ग के लोगों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखते हुये ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमारा भविष्य इसी वर्ग के कंधो पर होगा।
चैपट राजाओं की इस अंधेर नगरी में दीपक जलाने का प्रयास पूरी तरह व्यर्थ है क्योंकि विकास का चक्रवात बेकाबू हो चुका है। खैर जो भी हो, अब हम निश्चित तौर पर एक विकसित राष्ट्र तो हो ही जायेंगे क्योंकि विकास में बाधक कहलाये जाने वाले लोग स्वप्रेरणा से अपना बलिदान देने को उत्सुक हैं। न जाने कितने ही लोग देश के विकास की विभिन्न भावी परियोजनाओं की भूमि पर भूखे पेट बैठे तपस्या कर रहे हैं। भगवान के घर देर है अंधेर नहीं, ईश्वर इन लोगों को जल्द ही खुद में विलीन करके मोक्ष की प्राप्ति करवायेगा। इस सम्बन्ध में मुझसे ज्यादा हमारे विकास के फरिश्ते आश्वस्त हैं। और ऐसा होना समय की माँग भी है क्योंकि जीवन के लिये नितान्त आवश्यक वस्तुओं जैसे आधुनिक वाहन, उपकरण, सौंदर्य प्रसाधन, विभिन्न प्रकार के शीतल पेय, सुन्दर भवनों, इत्यादि कई का सतत उत्पादन जारी है और यदि इनका समय से उपभोग न किया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था चरमरा नहीं जायेगी। गेंहूँ, चावल, दाल, सब्जी का क्या है, गलियों में मारी मारी फिरती हैं। अगर न भी मिलें तो कोई दिक्कत नहीं है, बाहर से इन्हें भी आयात कर लिया जायेगा। परन्तु कभी न भूलें कि सर्वाधिक महत्वपूर्ण तो विकास ही है क्योंकि कुछ भी खरीदने के लिये धन चाहिये और ये धन तो विकास कार्यक्रमों से ही आना है।
हमारे देश के कुशल राजनेताओं पर आज अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है क्योंकि विकास योजनायें बनाने और पूरी करवाने के साथ साथ उन्हें ही आज देश को आर्थिक रूप से बलवान बनाने के लिये ओवरटाइम करना पड़ रहा है। आज वे कड़ी मेहनत से इन्हीं योजनाओं में से कुछ धन बचाकर उसे किसी कम्पनी में निवेश कर रहे हैं कि देश तरक्की कर सके। कुछ क्रांतिकारी नेता तो जरा भी संशय की स्थिति में खुद की ही कम्पनी बना रहे हैं कि देश को जरा भी नुकसान न हो। मैं तो कुछ ऐसे भी नेताओं को भी जान रहा हूँ जिन्हांेने अभी तक तय नहीं किया है कि अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई का किस क्षेत्र में निवेश करें और इसलिये उन्होंने धन को सुरक्षित स्थानों पर जमा कर रखा हुआ है। ऐसे कर्मठ राजनेताओं को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम !
मुझे लगता है कि अब एक नये टाइप का जनजागरण अभियान चलाया जाना चाहिये क्योंकि बहुत से लोग आज के प्रचलित सामाजिक दृष्टिकोण से भिन्न मत रखते हैं। ऐसे लोगों को समझाने की आवश्यकता है कि जीवन से भी ज्यादा धन आवश्यक है और धन कमाने की दौड़ में एक तो वे पहले ही पीछे रह गये हैं और यदि वे अब भी न चेते तो वे पीछे दौड़ती भीड़ द्वारा बेरहमी से कुचल दिये जायेंगे। वैसे समाज में हर वर्ग की अपनी अहम जरूरत होती है, तो ऐसे लोग आज के समाज के महापुरूषों की अनुकम्पा से प्रदान किये जाने वाले पदों को भी ग्रहण कर सकते हैं। आपने तो सुना ही है कि ’’कोई छोटा-बड़ा नही होता’’। और आजकल तो वाकई में कभी कोई छोटा, बड़ा हो भी नहीं सकता है, वे तो बस बड़े ही हैं जो और बड़े होते जा रहे हैं।
मैं पहले ही एक सूक्ति का वर्णन कर चुका हूँ और अन्त में मुझे एक अन्य सूक्ति का ख्याल आ रहा है कि ’’जो होता है, अच्छे के लिये होता है’’। सबकुछ सबके लिये तो अच्छा हो नहीं सकता इसलिये अब देखने वाली बात ये है कि क्या किसके लिये अच्छा सिद्ध होता है।
हम भारतवासी हैं। हम जानते हैं कि विश्व बहुत तेजी से बदल रहा है और हमने भी इन परिवर्तनों को स्वीकार कर लिया है। आज हमारे विश्व में विकास के पैमाने बहुत अधिक बदल चुके हैं। आज की इस बदलती दुनिया में सभी देशों को ऊर्जा की बहुत अधिक आवश्यकता है क्योंकि सभी देशोें की ऊर्जा पर निर्भरता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। हम देख सकते हैं कि हमें बिजली, पेट्रोल, खनिज़, आदि की कितनी ज्यादा आवश्यकता है और हम जरूरत के मुताबिक इनका प्रबन्ध नही कर पा रहे हैं। हम यह भी जानते हैं कि ऊर्जा के ये सभी श्रोत हमेशा के लिये नही हैं और निरन्तर उपयोग से ये धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। आज कुछ बड़े उद्योगपतियों के इशारों पर जिस प्रकार हमारे राजनेता इन प्राकृतिक ऊर्जा श्रोतों की नीलामी पर तुले हैं वह तो अलग से शोध का विषय है। परन्तु सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इस बदलाव के दौर में बहुत ज्यादा आगे बढ़ जाने के पहले हमें एक बार अपनी जड़ों में झांकने की आवश्यकता है।
हमारे पूर्वज इशारों-इशारों में हमें इतना कुछ सिखा गये हैं कि अगर हम उनकी सिखाई बातों को अपने जीवन में अपनायें तो हमारे उभरते हुये भारत को ऊर्जा की समस्या से कभी ग्रस्त नही होना पड़ेगा। हमारे पूर्वजों को नहीं पता था कि खेती में कीटनाशकों का क्या काम है पर वो केंचुओं को बेकार का जीव नहीं मानते थे। उन्हें नहीं पता था कि शरीर में ग्लूकोज़ की क्या जरूरत है पर वे नींबू और गुड़ का शर्बत पीने के शौकीन थे। वो कभी ’वर्क आउट‘ करने जिम नहीं जाते थे क्योंकि उन्हें सुबह उठकर दौड़ना और कसरत करना आता था। उन्हें तो कभी पंखे और ए.सी. की भी जरूरत नहीं लगी पर वो घरों में पेड़ और खिड़कियों को बडा आवश्यक समझते थे।
प्रकृति सारी ऊर्जा की मालकिन है और हम जानते हैं कि ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट। हम केवल ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित कर सकते हैं पर हमें यह याद रखना चाहिये कि ये परिवर्तन किसी ऐसे रूप में न होता जाये जो चीजें हमारे लिये गैरसेहतमन्द हों। मगर जो हो रहा है वो बहुत बुरा है। पता नही ऐसा क्यों हो रहा है कि हम प्रकृति को भूलते हुये अधिक से अधिक ऊर्जा पर निर्भर होते चले जा रहे हैं। जबकि आप देख रहे हो कि बड़ी मात्रा में ऊर्जा उपभोग हमारे सामने इतनी गम्भीर समस्याएं लाकर खड़ा कर रहा है जिससे निपटना बहुत मुश्किल है।
आज कंक्रीट के जंगलों में हम बिल्कुल जानवरों की तरह स्वार्थी बनकर रह रहे हैं। हमें कोई मतलब नही हैं कि बगल का शहर या कस्बा किस समस्या से ग्रस्त है। चलिये मगर सौभाग्य से हमें यह तो चिन्ता है कि हमारी सन्तानें कैसे तरक्की करेंगी, पर उनके भी स्वस्थ भविष्य के विषय में कोई सोच ही नहीं रहा है। बहुत कम लोग जानते हैं कि सब्सिडी क्या होती है और एक लीटर पेट्रोल खरीदने पर हमारे साथ-साथ देश पर कितना भार आता है। इन बातों को देश को समझाना बड़ा मुश्किल है इसलिये देश को सिर्फ यह याद दिलाना चाहिये कि ऊर्जा पर पूर्ण निर्भरता हमारी तासीर के विपरीत है। और अब हमें खुद सोचने के साथ-साथ अपने बच्चों को भी सिखाना चाहिये कि हम उस देश के वासी हैं जहाँ हमें केवल प्रकृति पर ही निर्भर होना सिखाया गया है। ठीक है कि बिजली और पेट्रोल हमारे लिये अत्यन्त आवश्यक हो गये हैं पर अगर ये देश के लिये परेशानी का सबब बन रहे हैं तो वो आत्मविश्वास भी उतना ही आवश्यक है कि इनके बिना भी हम जी लेते हैं। फिर देखें हमारी अर्थव्यवस्था पर कौन ग्रहण लगाता है !
जब भी अपने देश की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की खामियां हमारे सामने आती हैं तो कहा जाता है कि हमारा लोकतन्त्र अभी अपने शैशवकाल में है, लोकतन्त्र को अपने असल रूप में आने में समय लगता है। सभी यह भी कहते हैं कि कोई भी शासन प्रणाली, लोकतांत्रिक शासन प्रणाली से बेहतर नहीं है एवं इसका कोई विकल्प भी मौजूद नहीं है। मैं इस तथ्य का प्रबल समर्थक हूँ कि किसी भी देश के नागरिकों को सही अर्थों में स्वतन्त्रता एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में ही मिल सकती है। परन्तु आज अपने लोकतन्त्र की जो कमियों उजागर हो रही हैं उसका कारण सिर्फ यह है कि जिस प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था को हमने अपनाया था, हम उस पर चल ही नही रहे हैं।
आज अपने देश में जिस प्रकार की सामाजिक असमानता फैलती जा रही है वह हमारे लोकतन्त्र के ऊपर एक प्रश्नचिन्ह तो लगाती ही है। अपने देश के लोगों ने जब खुद के लिये संविधान बनाकर इस लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को चुना था तो लक्ष्य यह था कि देश के अन्तिम व्यक्ति को उठाकर मुख्य धारा से जोड़ना है। क्या हम लोकतन्त्र के शैशवकाल की दुहाई देकर इस लक्ष्य की प्राप्ति में विफलता को भूल जायें ? किसी लोकतांत्रिक देश में नक्सली समस्या के लिये कोई जगह नहीं होती है और हमारा दुर्भाग्य देखिये कि हम इस समस्या का भी विकराल रूप देख रहे हैं। हम अपने लोकतन्त्र की विशेषताओं का जितना लाभ उठा सकते थे हमने उतना ही देशवासियों के साथ धोखा किया है। अब तो स्थिति ये है कि देश में एक ऐसा वातावरण तैयार हो गया है जो लोगों के बीच असमानता को तेजी से बढ़ा रहा है। आज हमारे नीति-नियन्ता इस देश का शासन जिस प्रकार से चला रहे हैं उसका भविष्य यही है कि धनी इतना धनी हो जाये कि देश की विकास दर के पीछे और सभी वर्ग बिल्कुल छिप जायें। हमारे पास जो वोट का हथियार है उसकी भी शक्ति समाप्त सी हो गयी है क्योंकि आज हमारे सामने कोई भी ऐसा विकल्प नही है जिससे हम कोई आशा कर सकें। किसी लोकतांत्रिक प्रणाली में राजनीति की ऐसी स्थिति की कोई कल्पना भी नही कर सकता है परन्तु आज यह कटु सत्य है।
इकोनाॅमिस्ट इन्टेलीजेंस यूनिट हर वर्ष वैश्विक लोकतन्त्र सूचकांक जारी करती है। इस सूचकांक में विभिन्न देशों की शासन प्रणाली को आंककर उन्हें पूर्ण लोकतन्त्र, दोषपूर्ण लोकतन्त्र, मिश्रित शासन तथा सत्तावादी प्रणाली की सूचियों में रखा जाता है। पिछले वर्ष के सूचकांक ने अपने देश में राजनीतिक भागीदारी, सरकारी कार्यप्रणाली और राजनीतिक संस्कृति की दशा को बेहद खराब बताते हुये देश के लोकतन्त्र को दोषपूर्ण लोकतन्त्र माना और विश्व में 39 वां स्थान दिया है।
आश्चर्य की बात यह है कि देश की राजनीति और प्रणाली में इतने दोष होने के बावजूद देश का गरीब वर्ग आज भी लोकतन्त्र का समर्थक है क्योंकि वह वास्तव में जानता है कि लोकतन्त्र का कोई विकल्प नहीं है। यह गरीब वर्ग इसी व्यवस्था पर निर्भर है और सुधार की आशा में है। जबकि देश के पूँजीपति वर्ग को अब इस व्यवस्था में व्यापार करने में आनन्द नही आ रहा है। वे जानते हैं कि अपने देश के लोकतन्त्र में जनहित, पँूजीपतियों के हित के ऊपर है। और मुझे लगता है कि जब तक हम इस लोकतन्त्र में जी रहे हैं देश का शासन सीधे पूँजीपतियों का हितसाधन नहीं कर पायेगा। अभी तक अपने देश के राजनीतिज्ञों ने देश में पँूजीपतियों को व्यापार करने में जो तरह-तरह कि सुविधायें दीं और दे रहे हैं उनमें कहीं न कहीं देश के गरीब वर्ग के उत्थान की भी बात करनी पड़ती है। परन्तु हमारे राजनीतिज्ञ इतने वर्षों में भी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि इन पूँजीपतियों में देश के विकास का रास्ता देखना सही नहीं है। मुझे तो ये लगता है कि वे जानबूझकर समझना ही नहीं चाहते हैं।
इन सब बातों को देखकर यह निष्कर्ष निकलता है कि लोकतन्त्र का विकल्प ढ़ूंढ़ने के बजाये हमें राजनीति का कोई ऐसा विकल्प ढूंढना होगा जिसके लिये हम सिर्फ संख्या न होकर भारत के लोग हों। हमारा लोकतन्त्र अब शैशवकाल में नही है बल्कि इतना आगे आ चुका है कि हमें खुद अपनी खामि़यां दिखला रहा है। मुहम्मद इकबाल ने भी क्या खूब कहा है-
‘‘जम्हूरियत वह तर्जे हुकूमत है जिसमें इन्सान की गिनती होती है, तौले नहीं जाते‘‘

हमारे देश में जितने भी ऐतिहासिक व्यक्ति हुए हैं उन सभी में एक समानता मिलती है कि वे सभी जो भी योजना बनाते थे उनमें बहुत आगे तक की सोच हुआ करती थी। वे अपना जीवन चाहे कितने ही कष्टों के साथ जी लिया करते थे पर उनमें अगली पीढ़ी के लिये एक प्रगतिपूर्ण सामाजिक वातावरण बुन लेने की तीव्र ललक थी। हमें डाॅ. राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे चिंतक नेताओं की विरासत मिली है जिन्होंने शायद ही कभी खुद के बारे में सोचा हो। शासन और सत्ता को ये जैसे चाहते इस्तेमाल कर सकते थे पर उन्होंने दूसरा ही रास्ता चुना। क्योंकि उन्हें पता था कि हमारे देश में लोगो को केवल सही दिशा दिखा देने से काम नही चलेगा बल्कि उनके साथ खड़े होकर उनका नेतृत्व करने की जरूरत है। उन्हें अच्छी तरह पता था कि सत्ता का नशा कितना खतरनाक है। परन्तु, आज की परिस्थिति बिल्कुल उलट है। आज जिस प्रकार समाज के हर क्षेत्र में लोगों का बौद्धिक स्तर गिरता जा रहा है, उसे देखकर तो यह लगता है कि अगर हम अपने वर्तमान की ही रक्षा कर सकने में सफल हो जायें तो यही बहुत बड़ी बात है। अब सुखद भविष्य का सपना बिल्कुल छोड़ ही दीजिये क्योंकि अगर स्थिति में कोई बड़ा परिवर्तन नही आया तो हमारा भविष्य बद् से बद्तर होने वाला है।
आज हम अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के जिस रूप को देख रहे हैं, यह वो रूप बिल्कुल नही है जिसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने की थी। हमारी राजनीतिक पार्टियों ने देश को अपनी अपनी स्टाइल में चला-चलाकर बहुत ज्यादा घिस दिया है। अभी भी कोई भी दल अपनी आदत से बाज नही आ रहा है और नित्य नयी संजीवनी लिये कोई नेता आपको समझाता मिल जायेगा कि ये हो जाये तो परिवर्तन आ जायेगा। ये जो भी सुझाव हमारे सामने आते हैं, वास्तव में उनपर अमल करने से पहले हमें अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुरूस्त करना होगा। आज हमारे देश की राजनीति में सभी दल कहीं न कहीं एक दूसरे के सहयोगी की तरह काम करने लगे हैं। इन सभी दलों ने हमारे सामने ऐसे हालात खडे़ कर दिये हैं कि चाहे हम इस दल को वोट दें या उस दल को, ले-देकर बात बराबर ही रहती है। इन सभी दलों के नेताओं को पूर्ण विश्वास है कि शासन और सत्ता की लगाम इन्ही लोगों के हाथों में घूमती रहेगी। उन सभी ने अपने-अपने गिरेबान में झांककर देख लिया है और वो जानते हैं कि आज अगर एक दल ने दूसरे का पर्दाफाश किया तो कल उसकी बारी होगी। आप खुद देखते हैं कि अगर एक दल किसी दूसरे पर कोई आरोप लगाता है तो सफाई आने के बजाय दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ता है। ऐसी दशा में आज सभी राजनीतिक पार्टियाँ हमारी पहुँच से दूर हो चुकी हैं। क्या हमारे संविधान निर्माताओं ने कभी सोचा होगा कि जो भारत के लोग अपने प्रतिनिधि चुनकर सरकार बनवायेंगे, उन्ही की कोई सुध नही लेगा।
आज अपने देश में हर चुनाव को लड़ने का एक रेट तय है। सभासद से लेकर सांसद तक का चुनाव लड़ने वाले हर व्यक्ति को अच्छी तरह पता होता है कि उसे पार्टी-टिकट खरीदने से लेकर चुनाव जीतने और और फिर पूरे कार्यकाल के दौरान पार्टी फंड के लिये कितना जुगाड़ना होगा। ये सारा धन जो भी चुनाव लड़ने और पार्टियों के भविष्य के चुनावों के लिये जुटाया जाता है, वो सब न जाने कितने वर्षों से हम चुकाते चले आ रहे हैं। ये सभी दल मौसेरे भाई बने हमें ठग रहे हैं और यदि कोई व्यक्ति इस सबके खिलाफ आवाज़ उठाने की कोशिश भी करता है तो उसे ऐसे दबाया जाता है कि वो औरों के लिये मिसाल बन जाये। स्थिति की गंभीरता को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि आम नागरिक तो छोडि़ये अगर कोई संवैधानिक संस्था सरकार के फैसलों पर प्रश्नचिन्ह लगाये तो सरकार उनपर भी टिप्पणी करने में कोई संकोच नही कर रही है।
आज हमारी राजनीतिक पार्टियों की दूरदर्शिता विलुप्त हो रही है और ज्यादा से ज्यादा इतनी दूरदर्शिता देखने को मिल रही है कि वो किस प्रकार अपना कार्यकाल पूरा कर सकती हैं। इसका कारण है कि एक तो सत्ता के नशे और धन के लोभ ने हमारे नेताओं की चिन्तन शक्ति को क्षीण कर दिया है। और दूसरी ओर आज के राजनीतिक परिदृश्य में जहाँ चुनाव लड़ने के लिये जेब मोटी होना आवश्यक है, उस क्वालिटी के लोग विधायिका नहीं पहुच पा रहे हैं जिनकी हमें जरूरत है। एक ही व्यक्ति पर लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की कृपा के उदाहरण कम ही होते हैं। इसमें उनकी गलती नही है, वास्तव में घूम फिर के इसमें भी गलती हमारी ही है क्योंकि हमीं लोगों ने तो उन्हें चुना है। राजनीति में धनबल की ऐसी घुसपैठ से बिना कोई कठोर कदम उठाये मुक्ति नही मिल पायेगी। मुझे तो यहाँ तक लगता है कि देशहित में सरकार की उच्चस्तरीय अति गोपनीय बैठकों का भी मुख्य मुद्दा यही रहता होगा कि अगर बहुमत सिद्ध करना पड़ा तो कितना लग जायेगा !
अपने देश की क्या दशा है अथवा हो गयी है, यह बात हमारे देश में हमेशा से राष्ट्रीय चिन्तन का केन्द्र रही है। चाहे वो सत्ता के गलियारे हों अथवा गली के नुक्कड़, सभी जगह लोग एक विशेषज्ञ की भाँति देश की वर्तमान दशा पर अपनी-अपनी टिप्पणियां देते हैं। ये केवल हमारे ही देश की विशेषता है कि हर समय देश के विभिन्न कोनों में तरह-तरह के लोग राष्ट्रचिन्तन में सदैव ही लगे रहते हैं। इतनी प्रचुर मात्रा में चिन्तकों की आबादी होने के बावजूद इस देश में किसी समस्या का कोई स्थायी निदान नही निकल पाता, इसकी कोई तो वजह होगी। मेरे मुताबिक निदान ढ़ूढ़ पाने में हम असमर्थ इसलिये दिखते हैं क्योंकि देश का सारा बौद्धिक तबका केवल देश की दशा सुधारने के लिये जद्दोजहद कर रहा है जो प्रयास नाकाफी मालूम पड़ रहे हैं। आज देश की दशा सुधारने की जो विचारधारा हर व्यक्ति के दिमाग में है वो खुद में ही पूर्ण नही है। मेरा मतलब है कि हम ये करके या वो करके सब कुछ ठीक कर लेगें अथवा सबकुछ ठीक कर लेने की ओर आगे बढ़ जायेंगे, ऐसी सोच से हमारा भला हो पाना बड़ा मुश्किल है।
आज देश की दशा सुधारने के लिये विकास योजनायें बनाने से पहले हमें एक सही दिशा की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। हमें वो दिशा खोजनी है जिसके पथ का अन्त विकास के चरम बिन्दु पर हो तथा जिसके दोनो ओर पूरा भारत खडा़ हो। आज हम चाहे जितने विशेषणों को विकास के साथ चिपकाकर नई-नई योजनाओं की चाशनी में भिगोकर लोगों के सामने पेश करें, वो वास्तव मे हमारे लिये कल्याणकारी नही हो सकता है। इन सारी योजनाओं को लेकर चाहे जितनी बातें हों पर ये हमारी आकांक्षाओं पर खरी नही उतर पाती हैं क्योकि इनका दायरा बहुत ही संकीर्ण होता है। किसी भी देश के विकास कार्यक्रमों की रूपरेखा में वहाँ की सरकार कुछ प्राथमिकतायें सुनिश्चित करती है कि हम इस प्रकार से सरकार चलायेंगे और इस प्रकार से देश को और ऊपर उठाने का प्रयास करेंगे। आज हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह हो गया है कि अब सरकार विभिन्न दलों के गठबंधन से बनती है और जिनकी पहली प्राथमिकता सरकार चलाने की होती है। अपनी यही प्राथमिकता पूरी करते-करते सरकार के पाँच वर्षों का समय गुज़र जाता है, पर बीच-बीच में माहौल बनाने के लिये हमारे सामनेे विकास का कोई न कोई नया शगूफा जरूर छोड़ दिया जाता है। यही हमारे विकास कार्यक्रमों के पीछे की कड़वी सच्चाई है।
अगर हम अपने को एक असली शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखना है तो हमें सुनिश्चित करना होगा कि अपनी विकासधारा की दिशा देश में भीतर की ओर हो। पहले हमें भीतर से ठोस होने की आवश्यकता है न कि बाहरी पाॅलिश की। हमें विकास के पूरे जत्थे को सबसे पहले अपने गांवो में लेकर जाना होगा और वहाँ से फिर से एक नयी शुरूआत करने का प्रयास प्रारम्भ करना होगा। हमारे किसान हमारे अन्नदाता है और केवल गांव की भूमि में ही मातृभूमि की असली महक बरकरार है इसलिये हमें इनके सम्मान के लिये आगे आना चाहिये। हमें हमारी फसल में बढ़ोत्तरी करने और किसानों में आत्मविश्वास भरने की आवश्यकता है। ऐसा करने के लिये किसानों का ऋण या ब्याज माफ करने के बजाय उन्हे आत्मनिर्भर बना सकने वाली योजनाओं की आवश्यकता है। इस काम को करने में हमें यह भी याद रखना होगा कि धीरे-धीरे कहीं ऐसी स्थिति न आ जाये कि हमारी आगे आने वाली पीढि़यां यूरिया को कोई प्राकृतिक तत्व ही मानने लगें।
आज हमारे नेता खुद को नीतिनिर्माता समझ रहे हैं और सिर्फ उस भारत के विकास की चिन्ता कर रहे हैं जो उनके आर्थिक खेलों को समझकर भी नासमझ बना रहता है। और कोई कुछ सुन और समझ न पाये इसलिये लगातार वैश्वीकरण का भोंपू बजाते रहते हैं। अभी हाल ही में जिस विदेशी निवेश को हमारे देश के कई बड़े नेता, किसानों के लिये औषधि के रूप में पेश कर रहे हैं और हमें समझा रहे हैं कि कैसे विदेशी कम्पनियाँ हमारे किसानों से सीधे फसल खरीदकर उन्हें अधिक मूल्य प्रदान करेंगी। मैं सरकार के तर्क पर एक छोटी सी बात यह कहना चाहता हूँ कि क्यों न विदेशी निवेश को देश में लाने से पहले हमारी सरकार पूरे देश की फसलों के निर्यात का अधिकार उन्ही किसानो के हाँथ में दे देती हैं। मेरे मुताबिक सरकार फालतू ही विदेशी निवेश के मुद्दे पर इतना उलझ रही है, किसानों को सीधा लाभ तो इस कदम से भी दिया जा सकता है।
आज हम जिस दिशाहीन विकासपथ पर घिसट रहे हैं, उसके पीछे कई तरह के तर्क दिये जाते हैं। हमें बताया जाता है कि आज विश्व क्या पूरा ब्रह्मांड ही तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव के साथ हमें भी लगातार बदलते रहना होगा। इस प्रकार का तर्क देने वाले लोग ये तथ्य क्यों याद नही रखते बदलाव के इस दौर में हम जिनसे प्रतियोगिता कर रहे हैं, वे देश अपनी अर्थव्यवस्था को बहुत पहले ही भीतर से ठोस बना चुके हैं। आज हमें सिखाया जा रहा है कि अगर आपके पास 2 लाख रूपये हैं और आपको 10 लाख की कार लेनी है तो तुरन्त लोन का आवेदन कर दो। ये विकास के अन्धे फरिश्ते भूल गये कि एक ठेठ भारतीय 10 लाख की कार के बारे में तो सोचता ही तब है जब उसके पास 20 लाख होते हैं। इसलिये अगर हम अपनी भारतीयता को भूलकर विकास को बाहर से भीतर की ओर ले जाने का प्रयास करेगें तो हम सफल नही हो पायेंगे। जिस प्रकार की नीतियों पर पिछले कुछ सालों से हमने चलना शुरू किया है उनने हमारी आत्मनिर्भरता पर चोट की है। पिछले कई सालों के उतार-चढ़ाव देखने के बाद, मुझे हमारी अर्थव्यवस्था खोखली नज़र आ रही है और खेती ही एकमात्र ऐसा विश्वसनीय तरीका दिख रहा है कि जिसको अगर हमने ताकत दे दी तो कोई हमारे आसपास भी नही टिक सकेगा। क्योंकि बन्दूक और पेट्रोल के बिना तो जीवन सम्भव है परन्तु भोजन के बिना नहीं। किसी की लिखीं दो पंक्तियाँ हैं -
जुनून का दौर है, किस-किस को जायें समझाने;
इधर भी अक्ल के दुश्मन, उधर भी दीवाने ।
अपने देश के खुदरा उद्योग में विदेशी निवेश की अनुमति की अधिसूचना पारित होने के तुरन्त बाद देश में जिस प्रकार की आर्थिक बहस का माहौल बना है वो काबि़ल-ए-तारीफ है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जहाँ एक ओर संसद की कुर्सियां धूल खा रही हैं गनीमत है कि न्यूज़ चैनलों के बाहर नेताओं की कतारें हैं और वे अपने विवेकानुसार, हमें अपने-अपने पक्ष समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बहस में दो ध्रुव निकल कर सामने आये हैं, एक वर्ग सीधे किसानों को ढाल बनाकर विदेशी निवेश की आलोचना कर रहा है वहीं दूसरा वर्ग शहरी उपभोक्ताओं के आर्थिक लाभों को ध्यान में रखकर किसानों को उनकी फसलों का अधिक से अधिक मूल्य दिला देने हेतु विदेशी निवेश लाने पर तुला है। मेरे मुताबिक ऐसे क्लिष्ट विषय पर कोई नेता क्या किसी वरिष्ठ बुद्धिजीवी के लिये भी कोई सपाट राय कायम कर पाना सम्भव नहीं होगा। फिर भी, जैसे हमारे लिये लोकतन्त्र में वोट देना जरूरी है वैसे ही राष्ट्रहित के किसी मुद्दे पर अपनी राय बनाना भी हमारा कर्तव्य है।
एक भारतीय होने के नाते मेरी राय में भारत जिस प्रकार का देश है और भारतीय जिस प्रकार के लोग हैं, उनका अंतःकरण ऐसे विदेशी निवेश से कभी संतुष्ट नही हो सकेगा। हमने अपने भारत को एक समाजवादी (बल्कि गांधीवादी समाजवाद) देश के रूप में स्थापित किया था। समय-समय पर हमारे लोकतन्त्र के विभिन्न स्तम्भ हमें बताते रहते हैं कि उसी परिकल्पना पर हमारा राष्ट्र-निर्माण जारी है और जल्द ही हम सफल होने वाले हैं। हम सभी को याद रखना चाहिये कि हमारा नया भारत कितना ही आधुनिक क्यों न होता चला जाये, हमारा असली भारत जो हमारे गांवो में बसता है और खेती करता है वही हमारी नींव है। संसार को प्राकृतिक सम्पदायें बांटते समय प्रकृति हमसे कतई नाराज नहीं थी और इसलिये हम अगर अपने असली भारत को ईमानदारी से सशक्त करें तभी वह समग्र विकास हो सकता है जिसकी कामना में सब लगे हैं। देश को विकास के पथ पर दौड़ाने के लिये न तो हमें हथियार बनाने की जरूरत है और न ही आतंकवादी। हम खुद मेें एक उपमहाद्वीप हैं और अगर हम देश के सारे दरवाजे बन्द कर लें तो शायद हमें बाहर की किसी चीज की आवश्यकता न पड़े पर दुनिया अवश्य ही बौद्धिक तौर पर कमजो़र हो जायेगी। सन् 1992 में हमारे देश के एक कुशल वित्त मन्त्री ने देश की लचर अर्थव्यवस्था को संभालते हुये देश में जिस प्रकार का उदारीकरण लेकर आये उससे हमें वैसे लाभ तो कतई नही हुये जैसे उन्होंने वायदे किये थे। और तो और आज वही कुशल वित्त मन्त्री एक कमजोर और भ्रष्ट प्रधानमन्त्री के रूप में प्रसिद्धि पाने के साथ-साथ अपने पद पर विराजमान हैं। जिस प्रकार की पूँजीवादी नीतियाँ हमारे देश में लागू हो चुकी हैं या होने वाली हैं वे किसी भी रूप में असली भारत के हित में नही हैं। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश था, है और रहेगा।
इस विदेशी निवेश के अपने देश में आ जाने के बाद की परिस्थिति पर अगर उपरिवर्णित दोनों वर्गों के तर्कों की आप पड़ताल करें तो आप पायेंगे कि हर तर्क के जवाब में एक तर्क है। इन तर्कों के जवाबी हमलों का कोई अन्त भी नही दिख रहा है क्योंकि अपने देश के लिये खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश बिल्कुल नया विषय है और सभी लोग केवल आंकणों (जो अपने देश में सरकारी तथा गैरसरकारी दो विपरीत किस्म के होते हैं) अथवा आशंकाओं पर ही तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। इस विदेशी निवेश को सीधे किसानों से जोड़कर देखा जा रहा है जबकि अपने देश का विशाल उपभोक्ता वर्ग भी इसके दायरे में आने वाला है। ये उपभोक्ता वर्ग वही है जिसके लिये आज का वैश्विक बाजार पहले तो तरह-तरह की बीमारियां बनाता है फिर उनका समाधान बेचता है। वास्तव में धीरे-धीरे यह स्थिति आ गयी है कि अब इसी बाजार पर हमारी पूरी दिनचर्या निर्भर होती जा रही है। और अब अगर ऐसे बाजार को अपने देश में व्यापार की खुली छूट मिली तो न जाने यह हमें कौन-कौन सी आदतें डलवा देगा।
आज का भारत विश्व पटल पर और किसी रूप में जाना जाये अथवा नहीं, एक बड़ा बाजा़र तो जरूर दिखता है। हर कोई इस बाजार का लाभ उठाने की जुगत में है। जब किसी विदेशी कम्पनी को हमारे देश में निवेश की अनुमति मिलती है तो सरकारें हमें यही समझाने में लग जाती हैं यह निवेश सिर्फ और सिर्फ हमारी बेहतरी और खुशहाली के लिये है। खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश पर भी हमें समझाया जा रहा है कि इससे हमारे किसानों को उनकी फसल की अधिक कीमत मिलेगी, उपभोक्ताओं को खुदरा सामान कम दामों में मिलेगा और लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा। मुझे बस एक प्रश्न का उत्तर चाहिये कि गांधी और नेहरू की विरासत वाले इस देश में आज तक किसानों के जीवन-स्तर पर कोई विशेष बेहतरी देखने को क्यों नही मिली जबकि देश का किसान ही देश की विकास योजनाओं के केन्द्र में था। आज हमारा राष्ट्र विदेशी मुनाफाखोरों से अपेक्षा कर रहा है कि वे किसानों की सोचेंगे जो केवल अधिक से अधिक लाभ कमाने की नीति पर चलते हैं। भाई लोग कह रहे हैं कि एक बार विदेशी निवेश आने तो दीजिये, उसकी अच्छाई-बुराई खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी, इसे एक मौका तो मिलना ही चाहिये। मुझे ऐसे विचारों पर भी कठोर आपत्ति है क्योंकि नम्बर एक हम एक देश हैं, कोई प्रयोगशाला नही और नम्बर दो अंग्रेजो की गुलामी की नींव चार-पाँच व्यवसायिओं ने ही आकर रखी थी और यहाँ तो कम्पनियाँ पूरे ताने-बाने के साथ आने वाली हैं।
हमारे देश को पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की चकाचैंध से हमेशा बचकर चलना होगा क्योंकि अगर सब कुछ अच्छा भी हुआ तो भी यह केवल शहरी भारत को ही लाभ दे पायेगी। यदि शहरी भारत का विकास होगा तो असली भारत पिछड़ेगा और इससे एक ही भारत में दो विपरीत भारत बन जायेगें और ऐसी स्थिति संभाले नही संभलेगी। आज वैसे ही अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती चली जा रही है उसपर कोई पुल बनाने के बजाये इस प्रकार के विदेशी निवेश से भगवान जाने कौन सा लाभ होने वाला है। खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश पर एक टिप्पणी अपने असली भारत से भी-
’’ ई सब पंचै हमरा का भला करिहैं, बनिया तो ससुर आपन बाप का भी नही होता’’