Sunday, September 30, 2012

दशा सुधारने की दिशा


अपने देश की क्या दशा है अथवा हो गयी है, यह बात हमारे देश में हमेशा से राष्ट्रीय चिन्तन का केन्द्र रही है। चाहे वो सत्ता के गलियारे हों अथवा गली के नुक्कड़, सभी जगह लोग एक विशेषज्ञ की भाँति देश की वर्तमान दशा पर अपनी-अपनी टिप्पणियां देते हैं। ये केवल हमारे ही देश की विशेषता है कि हर समय देश के विभिन्न कोनों में तरह-तरह के लोग राष्ट्रचिन्तन में सदैव ही लगे रहते हैं। इतनी प्रचुर मात्रा में चिन्तकों की आबादी होने के बावजूद इस देश में किसी समस्या का कोई स्थायी निदान नही निकल पाता, इसकी कोई तो वजह होगी। मेरे मुताबिक निदान ढ़ूढ़ पाने में हम असमर्थ इसलिये दिखते हैं क्योंकि देश का सारा बौद्धिक तबका केवल देश की दशा सुधारने के लिये जद्दोजहद कर रहा है जो प्रयास नाकाफी मालूम पड़ रहे हैं। आज देश की दशा सुधारने की जो विचारधारा हर व्यक्ति के दिमाग में है वो खुद में ही पूर्ण नही है। मेरा मतलब है कि हम ये करके या वो करके सब कुछ ठीक कर लेगें अथवा सबकुछ ठीक कर लेने की ओर आगे बढ़ जायेंगे, ऐसी सोच से हमारा भला हो पाना बड़ा मुश्किल है।
आज देश की दशा सुधारने के लिये विकास योजनायें बनाने से पहले हमें एक सही दिशा की सबसे ज्यादा आवश्यकता है। हमें वो दिशा खोजनी है जिसके पथ का अन्त विकास के चरम बिन्दु पर हो तथा जिसके दोनो ओर पूरा भारत खडा़ हो। आज हम चाहे जितने विशेषणों को विकास के साथ चिपकाकर नई-नई योजनाओं की चाशनी में भिगोकर लोगों के सामने पेश करें, वो वास्तव मे हमारे लिये कल्याणकारी नही हो सकता है। इन सारी योजनाओं को लेकर चाहे जितनी बातें हों पर ये हमारी आकांक्षाओं पर खरी नही उतर पाती हैं क्योकि इनका दायरा बहुत ही संकीर्ण होता है। किसी भी देश के विकास कार्यक्रमों की रूपरेखा में वहाँ की सरकार कुछ प्राथमिकतायें सुनिश्चित करती है कि हम इस प्रकार से सरकार चलायेंगे और इस प्रकार से देश को और ऊपर उठाने का प्रयास करेंगे। आज हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह हो गया है कि अब सरकार विभिन्न दलों के गठबंधन से बनती है और जिनकी पहली प्राथमिकता सरकार चलाने की होती है। अपनी यही प्राथमिकता पूरी करते-करते सरकार के पाँच वर्षों का समय गुज़र जाता है, पर बीच-बीच में माहौल बनाने के लिये हमारे सामनेे विकास का कोई न कोई नया शगूफा जरूर छोड़ दिया जाता है। यही हमारे विकास कार्यक्रमों के पीछे की कड़वी सच्चाई है।
अगर हम अपने को एक असली शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखना है तो हमें सुनिश्चित करना होगा कि अपनी विकासधारा की दिशा देश में भीतर की ओर हो। पहले हमें भीतर से ठोस होने की आवश्यकता है न कि बाहरी पाॅलिश की। हमें विकास के पूरे जत्थे को सबसे पहले अपने गांवो में लेकर जाना होगा और वहाँ से फिर से एक नयी शुरूआत करने का प्रयास प्रारम्भ करना होगा। हमारे किसान हमारे अन्नदाता है और केवल गांव की भूमि में ही मातृभूमि की असली महक बरकरार है इसलिये हमें इनके सम्मान के लिये आगे आना चाहिये। हमें हमारी फसल में बढ़ोत्तरी करने और किसानों में आत्मविश्वास भरने की आवश्यकता है। ऐसा करने के लिये किसानों का ऋण या ब्याज माफ करने के बजाय उन्हे आत्मनिर्भर बना सकने वाली योजनाओं की आवश्यकता है। इस काम को करने में हमें यह भी याद रखना होगा कि धीरे-धीरे कहीं ऐसी स्थिति न आ जाये कि हमारी आगे आने वाली पीढि़यां यूरिया को कोई प्राकृतिक तत्व ही मानने लगें।
आज हमारे नेता खुद को नीतिनिर्माता समझ रहे हैं और सिर्फ उस भारत के विकास की चिन्ता कर रहे हैं जो उनके आर्थिक खेलों को समझकर भी नासमझ बना रहता है। और कोई कुछ सुन और समझ न पाये इसलिये लगातार वैश्वीकरण का भोंपू बजाते रहते हैं। अभी हाल ही में जिस विदेशी निवेश को हमारे देश के कई बड़े नेता, किसानों के लिये औषधि के रूप में पेश कर रहे हैं और हमें समझा रहे हैं कि कैसे विदेशी कम्पनियाँ हमारे किसानों से सीधे फसल खरीदकर उन्हें अधिक मूल्य प्रदान करेंगी। मैं सरकार के तर्क पर एक छोटी सी बात यह कहना चाहता हूँ कि क्यों न विदेशी निवेश को देश में लाने से पहले हमारी सरकार पूरे देश की फसलों के निर्यात का अधिकार उन्ही किसानो के हाँथ में दे देती हैं। मेरे मुताबिक सरकार फालतू ही विदेशी निवेश के मुद्दे पर इतना उलझ रही है, किसानों को सीधा लाभ तो इस कदम से भी दिया जा सकता है।
आज हम जिस दिशाहीन विकासपथ पर घिसट रहे हैं, उसके पीछे कई तरह के तर्क दिये जाते हैं। हमें बताया जाता है कि आज विश्व क्या पूरा ब्रह्मांड ही तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव के साथ हमें भी लगातार बदलते रहना होगा। इस प्रकार का तर्क देने वाले लोग ये तथ्य क्यों याद नही रखते बदलाव के इस दौर में हम जिनसे प्रतियोगिता कर रहे हैं, वे देश अपनी अर्थव्यवस्था को बहुत पहले ही भीतर से ठोस बना चुके हैं। आज हमें सिखाया जा रहा है कि अगर आपके पास 2 लाख रूपये हैं और आपको 10 लाख की कार लेनी है तो तुरन्त लोन का आवेदन कर दो। ये विकास के अन्धे फरिश्ते भूल गये कि एक ठेठ भारतीय 10 लाख की कार के बारे में तो सोचता ही तब है जब उसके पास 20 लाख होते हैं। इसलिये अगर हम अपनी भारतीयता को भूलकर विकास को बाहर से भीतर की ओर ले जाने का प्रयास करेगें तो हम सफल नही हो पायेंगे। जिस प्रकार की नीतियों पर पिछले कुछ सालों से हमने चलना शुरू किया है उनने हमारी आत्मनिर्भरता पर चोट की है। पिछले कई सालों के उतार-चढ़ाव देखने के बाद, मुझे हमारी अर्थव्यवस्था खोखली नज़र आ रही है और खेती ही एकमात्र ऐसा विश्वसनीय तरीका दिख रहा है कि जिसको अगर हमने ताकत दे दी तो कोई हमारे आसपास भी नही टिक सकेगा। क्योंकि बन्दूक और पेट्रोल के बिना तो जीवन सम्भव है परन्तु भोजन के बिना नहीं। किसी की लिखीं दो पंक्तियाँ हैं -

                                             जुनून का दौर है, किस-किस को जायें समझाने;
                                             इधर भी अक्ल के दुश्मन, उधर भी दीवाने ।

Monday, September 24, 2012

चलो-चलो देश सुधारते हैं


अपने देश के खुदरा उद्योग में विदेशी निवेश की अनुमति की अधिसूचना पारित होने के तुरन्त बाद देश में जिस प्रकार की आर्थिक बहस का माहौल बना है वो काबि़ल-ए-तारीफ है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जहाँ एक ओर संसद की कुर्सियां धूल खा रही हैं गनीमत है कि न्यूज़ चैनलों के बाहर नेताओं की कतारें हैं और वे अपने विवेकानुसार, हमें अपने-अपने पक्ष समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बहस में दो ध्रुव निकल कर सामने आये हैं, एक वर्ग सीधे किसानों को ढाल बनाकर विदेशी निवेश की आलोचना कर रहा है वहीं दूसरा वर्ग शहरी उपभोक्ताओं के आर्थिक लाभों को ध्यान में रखकर किसानों को उनकी फसलों का अधिक से अधिक मूल्य दिला देने हेतु विदेशी निवेश लाने पर तुला है। मेरे मुताबिक ऐसे क्लिष्ट विषय पर कोई नेता क्या किसी वरिष्ठ बुद्धिजीवी के लिये भी कोई सपाट राय कायम कर पाना सम्भव नहीं होगा। फिर भी, जैसे हमारे लिये लोकतन्त्र में वोट देना जरूरी है वैसे ही राष्ट्रहित के किसी मुद्दे पर अपनी राय बनाना भी हमारा कर्तव्य है।
      एक भारतीय होने के नाते मेरी राय में भारत जिस प्रकार का देश है और भारतीय जिस प्रकार के लोग हैं, उनका अंतःकरण ऐसे विदेशी निवेश से कभी संतुष्ट नही हो सकेगा। हमने अपने भारत को एक समाजवादी (बल्कि गांधीवादी समाजवाद) देश के रूप में स्थापित किया था। समय-समय पर हमारे लोकतन्त्र के विभिन्न स्तम्भ हमें बताते रहते हैं कि उसी परिकल्पना पर हमारा राष्ट्र-निर्माण जारी है और जल्द ही हम सफल होने वाले हैं। हम सभी को याद रखना चाहिये कि हमारा नया भारत कितना ही आधुनिक क्यों न होता चला जाये, हमारा असली भारत जो हमारे गांवो में बसता है और खेती करता है वही हमारी नींव है। संसार को प्राकृतिक सम्पदायें बांटते समय प्रकृति हमसे कतई नाराज नहीं थी और इसलिये हम अगर अपने असली भारत को ईमानदारी से सशक्त करें तभी वह समग्र विकास हो सकता है जिसकी कामना में सब लगे हैं। देश को विकास के पथ पर दौड़ाने के लिये न तो हमें हथियार बनाने की जरूरत है और न ही आतंकवादी। हम खुद मेें एक उपमहाद्वीप हैं और अगर हम देश के सारे दरवाजे बन्द कर लें तो शायद हमें बाहर की किसी चीज की आवश्यकता न पड़े पर दुनिया अवश्य ही बौद्धिक तौर पर कमजो़र हो जायेगी। सन् 1992 में हमारे देश के एक कुशल वित्त मन्त्री ने देश की लचर अर्थव्यवस्था को संभालते हुये देश में जिस प्रकार का उदारीकरण लेकर आये उससे हमें वैसे लाभ तो कतई नही हुये जैसे उन्होंने वायदे किये थे। और तो और आज वही कुशल वित्त मन्त्री एक कमजोर और भ्रष्ट प्रधानमन्त्री के रूप में प्रसिद्धि पाने के साथ-साथ अपने पद पर विराजमान हैं। जिस प्रकार की पूँजीवादी नीतियाँ हमारे देश में लागू हो चुकी हैं या होने वाली हैं वे किसी भी रूप में असली भारत के हित में नही हैं। हमारा देश एक कृषि प्रधान देश था, है और रहेगा।
      इस विदेशी निवेश के अपने देश में आ जाने के बाद की परिस्थिति पर अगर उपरिवर्णित दोनों वर्गों के तर्कों की आप पड़ताल करें तो आप पायेंगे कि हर तर्क के जवाब में एक तर्क है। इन तर्कों के जवाबी हमलों का कोई अन्त भी नही दिख रहा है क्योंकि अपने देश के लिये खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश बिल्कुल नया विषय है और सभी लोग केवल आंकणों (जो अपने देश में सरकारी तथा गैरसरकारी दो विपरीत किस्म के होते हैं) अथवा आशंकाओं पर ही तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। इस विदेशी निवेश को सीधे किसानों से जोड़कर देखा जा रहा है जबकि अपने देश का विशाल उपभोक्ता वर्ग भी इसके दायरे में आने वाला है। ये उपभोक्ता वर्ग वही है जिसके लिये आज का वैश्विक बाजार पहले तो तरह-तरह की बीमारियां बनाता है फिर उनका समाधान बेचता है। वास्तव में धीरे-धीरे यह स्थिति आ गयी है कि अब इसी बाजार पर हमारी पूरी दिनचर्या निर्भर होती जा रही है। और अब अगर ऐसे बाजार को अपने देश में व्यापार की खुली छूट मिली तो न जाने यह हमें कौन-कौन सी आदतें डलवा देगा।
आज का भारत विश्व पटल पर और किसी रूप में जाना जाये अथवा नहीं, एक बड़ा बाजा़र तो जरूर दिखता है। हर कोई इस बाजार का लाभ उठाने की जुगत में है। जब किसी विदेशी कम्पनी को हमारे देश में निवेश की अनुमति मिलती है तो सरकारें हमें यही समझाने में लग जाती हैं यह निवेश सिर्फ और सिर्फ हमारी बेहतरी और खुशहाली के लिये है। खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश पर भी हमें समझाया जा रहा है कि इससे हमारे किसानों को उनकी फसल की अधिक कीमत मिलेगी, उपभोक्ताओं को खुदरा सामान कम दामों में मिलेगा और लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा। मुझे बस एक प्रश्न का उत्तर चाहिये कि गांधी और नेहरू की विरासत वाले इस देश में आज तक किसानों के जीवन-स्तर पर कोई विशेष बेहतरी देखने को क्यों नही मिली जबकि देश का किसान ही देश की विकास योजनाओं के केन्द्र में था। आज हमारा राष्ट्र विदेशी मुनाफाखोरों से अपेक्षा कर रहा है कि वे किसानों की सोचेंगे जो केवल अधिक से अधिक लाभ कमाने की नीति पर चलते हैं। भाई लोग कह रहे हैं कि एक बार विदेशी निवेश आने तो दीजिये, उसकी अच्छाई-बुराई खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी, इसे एक मौका तो मिलना ही चाहिये। मुझे ऐसे विचारों पर भी कठोर आपत्ति है क्योंकि नम्बर एक हम एक देश हैं, कोई प्रयोगशाला नही और नम्बर दो अंग्रेजो की गुलामी की नींव चार-पाँच व्यवसायिओं ने ही आकर रखी थी और यहाँ तो कम्पनियाँ पूरे ताने-बाने के साथ आने वाली हैं।
      हमारे देश को पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की चकाचैंध से हमेशा बचकर चलना होगा क्योंकि अगर सब कुछ अच्छा भी हुआ तो भी यह केवल शहरी भारत को ही लाभ दे पायेगी। यदि शहरी भारत का विकास होगा तो असली भारत पिछड़ेगा और इससे एक ही भारत में दो विपरीत भारत बन जायेगें और ऐसी स्थिति संभाले नही संभलेगी। आज वैसे ही अमीरी और गरीबी की खाई बढ़ती चली जा रही है उसपर कोई पुल बनाने के बजाये इस प्रकार के विदेशी निवेश से भगवान जाने कौन सा लाभ होने वाला है। खुदरा व्यवसाय में विदेशी निवेश पर एक टिप्पणी अपने असली भारत से भी-
’’ ई सब पंचै हमरा का भला करिहैं, बनिया तो ससुर आपन बाप का भी नही होता’’