हम सभी कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की प्रणाली का हिस्सा हो चुके हैं और यह प्रणाली दिनोदिन और भी विकराल रूप लेती जा रही है। भ्रष्टाचार किसी एक विशेष स्तर पर विद्यमान न होकर पूरी प्रणाली में फैल चुका है। देश का पूरा सिस्टम, ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार के दंश से पीडि़त है। ऐसे में भ्रष्टाचार एक आर्थिक मामला न होकर मानवाधिकार का प्रश्न बन गया है। हमारा सर्वोच्च न्यायालय भी इस बात पर मुहर लगा चुका है कि भ्रष्टाचार एक व्यक्ति के मूलभूत मानवाधिकारों को प्रभावित करता है।
अन्तर्राष्ट्रीय पारदर्शिता सूची में भारत का 94 वां स्थान है। इसी सूची के मुताबिक सोमालिया सर्वाधिक भ्रष्ट देश है। इंग्लैण्ड और अमेरिका क्रमशः 14 वें तथा 19 वें स्थान पर हैं। अन्तर्राष्ट्रीय शोध बताते हैं कि विश्व के दो देश ऐसे हैं जिन्होंने अपने देश मंे भ्रष्टाचार से तंग आकर संस्थागत विधिवत् प्रयास किये और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में सफल रहे। ये देश हैं, सिंगापुर और हांगकांग। इन देशों ने विश्व के समक्ष, भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिये एक आदर्श माॅडल पेश किया है। इन देशों के अतिरिक्त स्कैण्डेनेवियन देश भी भ्रष्टाचार मुक्त हैं।
हम भारत के लोग एक ऐसे लोकतान्त्रिक समाज हैं जो वास्तव में ‘‘रूल आॅफ लाॅ‘‘ के सिद्धान्तों पर स्थापित नही हुआ है। हम वैसे समाज नही हैं जहाँ सिर्फ कानून का राज चलता हो। हमारा देश विविधताओं से भरा है और कानून के साथ-साथ न जाने कितने ही रीति-रिवाज और ना-ना प्रकार की परम्परायें हमारे समाज में घुली-मिली हैं। हम देखते आये हैं कि हमारे समाज में कानून से ज्यादा नैतिकता का डर होता है। अगर किसी कृत्य से जग-हसाई का भय हो तो एक सामान्य भारतीय वह कार्य करने से बचता रहा है। लेकिन समय बीतने के साथ समाज में कई तरह के परिवर्तन आ रहे हैं। आज के एक सामान्य भारतीय के मूल्य काफी हद तक बदल चुके हैं। नैतिकता का तराजू अपने गावों और कस्बों में छोड़कर लोगों ने मिलकर नये समाज बना लिये हैं। यह नया समाज 21 वीं सदी का भारत है जहाँ उन्नति पाने की होड़ लगी है और इस होड़ में हर तरह के समझौते किये जा रहे हैं। यह समझौते ही भ्रष्टाचार है।
भ्रष्टाचार बहुआयामी है और लगभग सभी क्षेत्रों में इसका प्रभाव पड़ता है। यह असमानता फैलाने का कारक है, अमीर-गरीब के बीच की खाई और गहरी करता है, सुशासन की राह का रोड़ा है, लोगों के अधिकारों का हनन करता है और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि लोगों का लोकतन्त्र पर से विश्वास डिगाता है। जब एक भ्रष्टाचारी अपने समस्त बुरे कृत्यों के बावजूद सफल दिखाई देता है तो एक सामान्य व्यक्ति उसी भ्रष्टाचारी के जैसी जीवनशैली प्राप्त करने के लिये भ्रष्ट तरीके अपनाने में लग जाता है। न तो नैतिकता में इतनी शक्ति रही कि वह भ्रष्टाचार को रोक सके और न ही देश के कानून सफल प्रतीत हो रहे हैं।
भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिये कई कानून पारित किये गये हैं और कई कानूनों की मांग जारी है। कई राज्य सरकारों ने अपने क्षेत्रों के लिये कानून पारित करके भ्रष्टाचार की रोकथाम करने का प्रयास किया है। कर्नाटक का लोकपाल अधिनियम तो देश के लिये आदर्श माॅडल है जोकि काफी हद तक कारगर भ्रष्टाचार-निरोधी कानून है। हमारे देश में संविधान प्रदत्त लेखाधिकारी है, सन् 1988 का ‘‘प्रिवेन्शन आॅफ करप्शन एक्ट‘‘ है, ‘‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005‘‘ है, सी.बी.आई., विजिलेंस, लोकपाल जैसी संस्थायें हैं। कुल मिलाकर देश में भ्रष्टाचार-निरोधी कानूनों की कोई कमी नही है, जरूरत है तो उनको उचित तरह लागू करने की। भ्रष्टाचार-निरोधी कानूनों की लिस्ट में सूचना का अधिकार अधिनियम एक सराहनीय कदम है। इस अधिनियम ने लोगों को सूचना का अधिकार प्रदान किया है और इस कानून ने भ्रष्टाचारियों के भीतर डर तो पनपाया ही है साथ ही जनमानस में आत्मविश्वास का संचार किया है। कई सर्वे बताते हैं कि एक घूस देने वाले व्यक्ति के बनिस्पत इस अधिनियम के प्रयोग से कामकाज जल्दी हो जाता है। इस देश में जहाँ लालफीताशाही समा चुकी थी और लोगों ने उससे समझौता कर लिया था को यह अधिनियम काट फेंकने में सक्षम है। परन्तु, इस अधिनियम का सकारात्मक प्रयोग करने के बजाये लोग इसे निहित स्वार्थों की पूर्ति में प्रयोग करने लगे हैं जिससे इसकी प्रासंगिकता कम हो रही है। निहित स्वार्थों से भरे हुये सूचना प्राप्ति के प्रार्थनापत्रों का सरकारी कार्यालयों में अंबार लगा रहता है जिससे शासन के कामों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। इस प्रकार इस क्रान्तिकारी कानून को भी समुचित प्रचार और उचित प्रकार लागू करने की आवश्यकता है।
भ्रष्टाचार के अधिकांश मामले पिछले तीन दशकों में हमारे सामने आये हैं। भ्रष्टाचार के खुलासे इस सम्बन्ध में बने कानूनों की वजह से ही सम्भव हो सके हैं परन्तु इन दशकों में यह भी देखने को मिला है कि हमने स्थापित भ्रष्टाचार निरोधी संस्थाओं को नष्ट किया और सदैव नई संस्थाओं के निर्माण के प्रयास में लगे रहे। हमारे सामने सिंगापुर और हांगकांग जैसे ज्वलंत उदाहरण है जिन्होंने एक ही संस्था के बल पर लगभग सौ फीसदी सार्थक परिणाम प्राप्त किये हैं। सन् 1970 में हांगकांग का वही हाल था जो आज भारत का है। टेक्नोलोजी के इस दौर में भ्रष्टाचार की रोकथाम और भी आसान है, सिर्फ अच्छी नियत की आवश्यकता है।
ऐसा नही है कि भ्रष्टाचार सिर्फ सरकारी संस्थानों में ही व्याप्त है बल्कि विकराल और प्रभावशाली प्राइवेट कोर्पोरेशन भी इस अपराध में संलिप्त हैं। पिछले चुनावों में 20,000 करोड़ से अधिक धन खर्च हुआ है जो साफतौर पर देश के राजनीतिक दलों और इन विकराल प्राइवेट संस्थानों के सम्बन्ध परिलक्षित करता है। ये प्राइवेट संस्थान इतने विकराल हैं कि कई का वार्षिक बजट एक राज्य के वार्षिक बजट से भी बड़ा होता है। हमें साफ दिखता है कि जो प्राईवेट कम्पनियाँ चुनावों में पैसा लगाकर किसी दल को जितवाती हैं वे बाद में उन पैसों का रिटर्न भी मांगेगी और सरकारें लोगों के हितों को ताक पर रखकर यह रिटर्न चुकायेंगी। सरकारी खरीद-फरोक्त, पाॅलिसी मेकिंग, योजनाओं के निर्माण आदि में इन संस्थानों का प्रभावशाली हस्तक्षेप होता है। ये सबकुछ सामने होने के बावजूद हमारे नेताओं को खूब जनसमर्थन प्राप्त है। मायावती, मुलायम, जयललिता, लालू, आदि भ्रष्टाचारी नेताओं के ज्वलंत उदाहरण हैं परन्तु इनके जनसमर्थन में कोई कमी नही है। हमारे देश में चैटाला जैसे निर्भीक और बेशर्म नेता भी हैं जो चुनावी नारा लगाते हैं ‘‘जेल जायेंगे, नौकरी दिलायेंगे‘‘। लेकिन हमारे पास इस स्पष्ट भ्रष्टाचार को रोकने की कोई स्कीम नही है।
न्यायालयों को भी भ्रष्टाचार निरोधक अंग की तरह काम करना चाहिये। सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय को नही बल्कि देश के जिला न्यायालयों को भी अपने महत्व को समझना होगा। हमें भोपाल गैस त्रासदी और जयललिता के मामले में जिला न्यायालय द्वारा की गयी कार्यवाहियों जैसे उदाहरण चाहिये। जिला न्यायालयों को सशक्त बनाये बिना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अधूरी है। जहाँ एक ओर अमेरिका की सर्वोच्च न्यायालय में सिर्फ 250 मुकदमें लम्बित हैं वहीं हमारे देश में यह संख्या 2,50,000 है। ऐसी परिस्थिति में संविधान के अनुच्छेद 32 उपखण्ड 4 का प्रयोग करके जिला न्यायालयों को भी रिट जारी करने की शक्ति प्रदान की जानी चाहिये। भ्रष्टाचार के किसी भी मुकदमें की सुनवाई का प्रथम न्यायालय जिला न्यायालय होता है और यदि वह सशक्त है तो मुकदमें के निस्तारण में न तो देर लगेगी और न ही लोगों का न्यायालय पर से विश्वास डगमगायेगा।
आजकल न्यायालयों का कामकाज भी कइ तरह के पूर्वाग्रहों का दास बनता जा रहा है। घटनाओं के मीडिया प्रचार के बल पर न्यायालय सी.बी.आई. जाँच के लिये आदेश पारित कर रहे हैं, कई सेवारत और रिटायर्ड जजों पर गम्भीर आपराधिक मामलों के आरोप लग रहे हैं, कई बड़े कारपोरेट और नेतागण निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं। न्याय पाने का सीधा ताल्लुक पैसे से हो गया है। देश में चुनिंदा ऐसे वकील हैं जिनको मुकदमा सौंप देने से आपके मुकदमा जीतने की सम्भावनायें 40 प्रतिशत तक बड़ जाती है चाहे न्याय की हार क्यों न हो रही हो। जस्टिस वी. आर. कृष्णाअय्यर ने इन सुपरस्टार वकीलों को ‘‘धनबल और राजनैतिक बल की विद्वान कालगल्र्स‘‘ कहकर बिल्कुल सही परिभाषित किया है।
विश्व के कई देश भ्रष्टाचार के अपराधों को तीन आयामों में देखते हैं, अपराध, अपराधी और प्रोपर्टी। कई देश भ्रष्टाचार में संलिप्त व्यक्ति को जेल भेजने के बजाये उस पर कई तरह से जुर्माना अधिरोपित करके धन वसूलते हैं। यह प्रक्रिया ‘‘नोन कनविक्शन बेस्ड अप्रोच‘‘ कहलाती है। यह प्रक्रिया ज्यादातर विकसित देशों में प्रचलित है जहाँ पर छुपा कर धन रखने की सम्भावनायें कम होती हैं। परन्तु, हमारे देश के लिये यह प्रक्रिया कारगर साबित नही हो सकेगी। उदाहरण के लिये जयललिता बड़ी आसानी 66 करोड़ के बजाये 100 करोड़ चुका सकती हैं, ऐसे में भ्रष्टाचारियों को सुधारने और समाज में सन्देश पहुँचाने के लिये ऐसे लोगों को जेल भेजना बहुत आवश्यक है।
अमत्र्य सेन ने खूब कहा है कि भ्रष्टाचार के मामले में हम शोषित, अपराध में शामिल और वादी, तीनों होते हैं। हमारे देश में घूस देना तथा लेना दोनो ही अपराध हैं और तभी कुछ चिन्तकों का मानना है कि घूस देने को अपराध की श्रेणी से बाहर रखना चाहिये तभी भ्रष्टाचार की रोकथाम को और बल मिलेगा। भ्रष्टाचार का प्रभाव सीधे एक व्यक्ति पर न पड़कर समाज के एक वर्ग पर पड़ता है इसलिये यह एक ऐसा जघन्य अपराध है जिसका सामूल नाश अत्यन्त आवश्यक है।
