Monday, October 12, 2015

ESSAY ON COW

दिसम्बर, 1946
महात्मा गांधी तथा लाॅर्ड माउण्टबेटन के बीच संवाद-
माउण्टबेटन- गांधी जी, अब भारत को स्वतंत्रता मिलने वाली है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद आप भारत में सबसे पहला काम क्या करेंगे?
महात्मा- कलम की पहली नोंक से सबसे पहले मैं भारत के सभी पशु कत्लखाने बन्द करवा दूंगा।
माउण्टबेटन- पर गांधी जी, भारत में भुखमरी, गरीबी और सांप्रदायिकता जैसी न जाने और कितनी गंभीर समस्याएं हैं तो सबसे पहले ये कत्लखाने ही क्यों बन्द करवाने हैं?
महात्मा- देखो माउण्टबेटन, अगर तुम मुझसे आजादी और कत्लखानों की बंदी में से कोई एक चुनने का विकल्प दोगे तो भी मैं दूसरे को ही चुनूँगा।
माउण्टबेटन- तो क्या इससे भारत की सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा?
महात्मा- समाधान का रास्ता अवश्य खुल जायेगा।
महात्मा और माउण्टबेटन के बीच का उपरोक्त संवाद लंदन के कई अखबारों में भी प्रकाशित हुआ था। गांधी व्यक्ति नही विचार थे जो बेहद दूरदर्शी और भारत की आत्मा को करीब से समझने की योग्यता रखते थे। 30 जनवरी, 1948 को महात्मा की हत्या कर दी गयी जो आज हमारे बीच सिर्फ फोटुओं में जिन्दा हैं, विचार के स्तर पर उनका सम्पूर्ण दफन किया जा चुका है।
गौ-हत्या पर जिस तरह की छिछली, सतही, अप्रामाणिक और जल्दबाजी में दी गयी टिप्पणियां प्राप्त हो रही हैं वो सिर्फ यह साबित कर रही हैं कि इतने गम्भीर विषय पर भी हमारा शासक वर्ग हमें भ्रमित करके अपने तुच्छ स्वार्थ सिद्ध करने पर तुला हुआ है। संगठित गौ-हत्या का इतिहास बहुत पुराना न होकर महज सवा सौ साल पुराना है जिसकी कुछ जानकारी होना बहुत जरूरी है।
इतिहास
सन् 1757 में राॅबर्ट क्लाइव ने धोखे से बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर भारत में कम्पनी राज्य का बिगुल फूंका और कम्पनी की फौज ने बंगाल में अपनी छावनी स्थापित की। अंगेजी फौज के जवानों को उनका प्रिय भोजन प्रदान करने के लिये कलकत्ता में पहला पशु कत्लखाना खोला गया और भारत में संगठित पशु हत्या की नींव डाली गयी। इस घटना के बाद, भारत के अन्य क्षेत्रों में जैसे-जैसे कम्पनी का शासन फैलता गया, पशु कत्लखानों की संख्या में इजाफा होता गया। कलकत्ता, बैरकपुर, पटना, मेरठ, रूड़की, आदि स्थानों पर जोर-शोर से पशु हत्या शुरू हो गयी। गौरतलब है कि भारत के सभी प्रमुख पशु कत्लखाने, मिलिट्री कैन्टोनमेन्ट से सटे हुये हैं। इन कत्लखानों में सभी जाति-धर्मों के भारतीयों को काम करने के लिये रखा जाता था और यह सिलसिला सन् 1857 तक बिना किसी व्यवधान के चलता रहा।
भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम, 1857 का एक प्रमुख कारण, कारतूसों में गाय तथा सुअर की चर्बी का प्रयोग किया जाना था जिसका सभी जाति-धर्म के भारतीयों ने विरोध किया था। अंगेजो ने यह भी देखा था कि भारत को आजाद कराने के लिये हिन्दू तथा मुसलमान दोनों कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे थे जिनको काबू करने में अंग्रेजों के छक्के छूट गये थे। यही वह समय था जब हमारी आज की कई गम्भीर सामाजिक समस्याओं के जहरीले बीज बोये गये थे।
सन् 1870 में स्वामी दयानन्द सरस्वती नामक एक महापुरूष ने आर्य समाज की स्थापना की जिसका मूल उद्देश्य था कि ‘‘वेदों की ओर लौटो‘‘। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये स्वामी जी ने देश के नौजवानों को आर्य समाज के साथ जोड़ा और गौ-रक्षा का प्रण लिया। आर्य समाज ने भारत के करीब 7,32,000 गांवों में इन्हीं नौजवानों की मदद से गौ-रक्षा समितियाँ बनाईं। आर्य समाज द्वारा संचालित गौ-रक्षा आन्दोलन सन् 1894 में अपने उच्चतम शिखर पर था जिसमें सभी जाति-धर्मांे के लोग जुड़ने लगे थे। आन्दोलन की अप्रत्याशित सफलता को देखकर अंग्रेज घबरा गये और इसी प्रतिक्रिया में ब्रिटेन की महारानी ने तत्कालीन गवर्नर जनरल को विस्तृत पत्र लिखकर, आन्दोलन के दमन हेतु कुटिल सुझाव दिये। महारानी ने उक्त पत्र के माध्यम से तत्कालीन गवर्नर जनरल को आदेश दिया कि अब से भारत के सभी पशु कत्लखानों में सिर्फ मुस्लिमों को ही काम पर रखा जाये। 
आपको जानकार हैरानी होगी कि सन् 1894 ही वह दुर्भाग्यशाली वर्ष है जब हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच प्रथम साम्प्रदायिक दंगा हुआ। सन् 1894 के पूर्व भारत में हिन्दू-मुस्लिम दंगे का कोई प्रमाण नही मिलता है। कत्लखानों में सिर्फ मुसलमानों को ही काम देने और हिन्दुओं के हृदय में मुसलमानों के प्रति जहर घोलकर, अंगे्रजों ने उक्त आन्दोलन विफल कर दिया और जानबूझकर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच नफरत का वातावरण तैयार कर दिया। बंगाल विभाजन और मुस्लिम लीग की स्थापना इसी श्रृंखला की कडि़याँ हैं जिसका परिणाम देश का बंटवारा है।
पशु हत्या से हानि
पशुओं की हत्या सीधे तौर पर प्रकृति से छेडछाड़ है और प्रकृति से छेडछाड़ हर हाल में मानव जीवन के लिये घातक है। यह सत्य है कि मानव जीवन का उदय मांसाहार से हुआ है परन्तु जैसे-जैसे मनुष्य सुसंस्कृत होता गया उसने भोजन के अन्य विकल्प खोज लिये। विश्व के विभिन्न प्रान्तों में सामाजिक उदय और सुसंस्कृति का आगमन अलग-अलग कालखण्डों में हुआ है और हो रहा और जब समाज पूर्ण विकसित हो जाता है, वह प्रकृति से कम से कम छेडछाड स्वीकार करता है। यह हमारे देश का गौरव है कि इतिहास के एक कालखण्ड में हमारा समाज पूर्णतया विकसित था और उस समय इस देश में माँस-भक्षण वर्जित नही था, अपितु लोगों ने स्वेच्छा से शाकाहार अपना लिया था। समय के साथ देश में विश्व की अन्य सभ्यताओं के लोगों का आगमन हुआ जिससे खानपान की विविधताओं का देश में पुनः फैलाव हो गया। कई स्थानों पर लोगों के पास मांसाहार के अतिरिक्त पेट भरने का कोई अन्य विकल्प भी नही है। परन्तु, वह समय अब दूर नही है जब खानपान की इन विविधताओं में से मांसाहार का पूरी तरह लोप हो जायेगा। विज्ञान से यह तथ्य प्रमाणित है मांसाहार ग्लोबल वार्मिंग के लिये बड़ा खतरा है और तभी विश्व के आज के विकसित देश शाकाहार का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं।
भ्रांतियाँ तथा उपसंहार
अपने छद्म स्वार्थों की पूर्ति के लिये देश के शासक वर्ग ने गौ-हत्या को वर्ग विभाजन का हतकंडा बना लिया है। शासक वर्ग को यह नही भूलना चाहिये कि भारत में सर्वाधिक पशु हत्या कोई हिन्दू या मुसलमान न करके, कत्लखानों के माध्यम से राज्य स्वयं कर रहा है। खाओ, पियो और मौज करो की विदेशी विचारधारा अपने देश में थोपी जा रही है जिसके तहत प्रकृति के ह्रास की कतई चिन्ता नही की जाती है। स्वामी विवेकानन्द जैसे योगियों द्वारा दिये गये बौद्धकाल के विवरण को कांट-छांट कर पेश किया जा रहा है जिससे लोगों में अनावश्यक भ्रम फैल रहा है। इन समाजविज्ञानियों की अधकचरी इतिहास की जानकारी लोगों को भटका रही है जो वैदिक काल और बौद्धकाल में भेद करने तक में असमर्थ हैं। हिन्दू और मुसलमानों को आपस में लड़ाते रहने की जो साजिश अंग्रेजों ने की थी, उसका पर्त-दर-पर्त पर्दाफाश करने के बजाये कुछ शक्तिशाली सत्ता-लोलुप लोग हमें बेकार की बहसों फंसाकर अपना उल्लू सीधा करते आये हैं, और यदि हम न चेते तो ये हमें ऐसे ही मूर्ख बनाते रहेंगे।

Tuesday, January 20, 2015

भ्रष्टाचार और सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक न्याय

हम सभी कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की प्रणाली का हिस्सा हो चुके हैं और यह प्रणाली दिनोदिन और भी विकराल रूप लेती जा रही है। भ्रष्टाचार किसी एक विशेष स्तर पर विद्यमान न होकर पूरी प्रणाली में फैल चुका है। देश का पूरा सिस्टम, ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार के दंश से पीडि़त है। ऐसे में भ्रष्टाचार एक आर्थिक मामला न होकर मानवाधिकार का प्रश्न बन गया है। हमारा सर्वोच्च न्यायालय भी इस बात पर मुहर लगा चुका है कि भ्रष्टाचार एक व्यक्ति के मूलभूत मानवाधिकारों को प्रभावित करता है।

अन्तर्राष्ट्रीय पारदर्शिता सूची में भारत का 94 वां स्थान है। इसी सूची के मुताबिक सोमालिया सर्वाधिक भ्रष्ट देश है। इंग्लैण्ड और अमेरिका क्रमशः 14 वें तथा 19 वें स्थान पर हैं। अन्तर्राष्ट्रीय शोध बताते हैं कि विश्व के दो देश ऐसे हैं जिन्होंने अपने देश मंे भ्रष्टाचार से तंग आकर संस्थागत विधिवत् प्रयास किये और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में सफल रहे। ये देश हैं, सिंगापुर और हांगकांग। इन देशों ने विश्व के समक्ष, भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिये एक आदर्श माॅडल पेश किया है। इन देशों के अतिरिक्त स्कैण्डेनेवियन देश भी भ्रष्टाचार मुक्त हैं।

हम भारत के लोग एक ऐसे लोकतान्त्रिक समाज हैं जो वास्तव में ‘‘रूल आॅफ लाॅ‘‘ के सिद्धान्तों पर स्थापित नही हुआ है। हम वैसे समाज नही हैं जहाँ सिर्फ कानून का राज चलता हो। हमारा देश विविधताओं से भरा है और कानून के साथ-साथ न जाने कितने ही रीति-रिवाज और ना-ना प्रकार की परम्परायें हमारे समाज में घुली-मिली हैं। हम देखते आये हैं कि हमारे समाज में कानून से ज्यादा नैतिकता का डर होता है। अगर किसी कृत्य से जग-हसाई का भय हो तो एक सामान्य भारतीय वह कार्य करने से बचता रहा है। लेकिन समय बीतने के साथ समाज में कई तरह के परिवर्तन आ रहे हैं। आज के एक सामान्य भारतीय के मूल्य काफी हद तक बदल चुके हैं। नैतिकता का तराजू अपने गावों और कस्बों में छोड़कर लोगों ने मिलकर नये समाज बना लिये हैं। यह नया समाज 21 वीं सदी का भारत है जहाँ उन्नति पाने की होड़ लगी है और इस होड़ में हर तरह के समझौते किये जा रहे हैं। यह समझौते ही भ्रष्टाचार है। 

भ्रष्टाचार बहुआयामी है और लगभग सभी क्षेत्रों में इसका प्रभाव पड़ता है। यह असमानता फैलाने का कारक है, अमीर-गरीब के बीच की खाई और गहरी करता है, सुशासन की राह का रोड़ा है, लोगों के अधिकारों का हनन करता है और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि लोगों का लोकतन्त्र पर से विश्वास डिगाता है। जब एक भ्रष्टाचारी अपने समस्त बुरे कृत्यों के बावजूद सफल दिखाई देता है तो एक सामान्य व्यक्ति उसी भ्रष्टाचारी के जैसी जीवनशैली प्राप्त करने के लिये भ्रष्ट तरीके अपनाने में लग जाता है। न तो नैतिकता में इतनी शक्ति रही कि वह भ्रष्टाचार को रोक सके और न ही देश के कानून सफल प्रतीत हो रहे हैं।

भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिये कई कानून पारित किये गये हैं और कई कानूनों की मांग जारी है। कई राज्य सरकारों ने अपने क्षेत्रों के लिये कानून पारित करके भ्रष्टाचार की रोकथाम करने का प्रयास किया है। कर्नाटक का लोकपाल अधिनियम तो देश के लिये आदर्श माॅडल है जोकि काफी हद तक कारगर भ्रष्टाचार-निरोधी कानून है। हमारे देश में संविधान प्रदत्त लेखाधिकारी है, सन् 1988 का ‘‘प्रिवेन्शन आॅफ करप्शन एक्ट‘‘ है, ‘‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005‘‘ है, सी.बी.आई., विजिलेंस, लोकपाल जैसी संस्थायें हैं। कुल मिलाकर देश में भ्रष्टाचार-निरोधी कानूनों की कोई कमी नही है, जरूरत है तो उनको उचित तरह लागू करने की। भ्रष्टाचार-निरोधी कानूनों की लिस्ट में सूचना का अधिकार अधिनियम एक सराहनीय कदम है। इस अधिनियम ने लोगों को सूचना का अधिकार प्रदान किया है और इस कानून ने भ्रष्टाचारियों के भीतर डर तो पनपाया ही है साथ ही जनमानस में आत्मविश्वास का संचार किया है। कई सर्वे बताते हैं कि एक घूस देने वाले व्यक्ति के बनिस्पत इस अधिनियम के प्रयोग से कामकाज जल्दी हो जाता है। इस देश में जहाँ लालफीताशाही समा चुकी थी और लोगों ने उससे समझौता कर लिया था को यह अधिनियम काट फेंकने में सक्षम है। परन्तु, इस अधिनियम का सकारात्मक प्रयोग करने के बजाये लोग इसे निहित स्वार्थों की पूर्ति में प्रयोग करने लगे हैं जिससे इसकी प्रासंगिकता कम हो रही है। निहित स्वार्थों से भरे हुये सूचना प्राप्ति के प्रार्थनापत्रों का सरकारी कार्यालयों में अंबार लगा रहता है जिससे शासन के कामों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है। इस प्रकार इस क्रान्तिकारी कानून को भी समुचित प्रचार और उचित प्रकार लागू करने की आवश्यकता है।

भ्रष्टाचार के अधिकांश मामले पिछले तीन दशकों में हमारे सामने आये हैं। भ्रष्टाचार के खुलासे इस सम्बन्ध में बने कानूनों की वजह से ही सम्भव हो सके हैं परन्तु इन दशकों में यह भी देखने को मिला है कि हमने स्थापित भ्रष्टाचार निरोधी संस्थाओं को नष्ट किया और सदैव नई संस्थाओं के निर्माण के प्रयास में लगे रहे। हमारे सामने सिंगापुर और हांगकांग जैसे ज्वलंत उदाहरण है जिन्होंने एक ही संस्था के बल पर लगभग सौ फीसदी सार्थक परिणाम प्राप्त किये हैं। सन् 1970 में हांगकांग का वही हाल था जो आज भारत का है। टेक्नोलोजी के इस दौर में भ्रष्टाचार की रोकथाम और भी आसान है, सिर्फ अच्छी नियत की आवश्यकता है।

ऐसा नही है कि भ्रष्टाचार सिर्फ सरकारी संस्थानों में ही व्याप्त है बल्कि विकराल और प्रभावशाली प्राइवेट कोर्पोरेशन भी इस अपराध में संलिप्त हैं। पिछले चुनावों में 20,000 करोड़ से अधिक धन खर्च हुआ है जो साफतौर पर देश के राजनीतिक दलों और इन विकराल प्राइवेट संस्थानों के सम्बन्ध परिलक्षित करता है। ये प्राइवेट संस्थान इतने विकराल हैं कि कई का वार्षिक बजट एक राज्य के वार्षिक बजट से भी बड़ा होता है। हमें साफ दिखता है कि जो प्राईवेट कम्पनियाँ चुनावों में पैसा लगाकर किसी दल को जितवाती हैं वे बाद में उन पैसों का रिटर्न भी मांगेगी और सरकारें लोगों के हितों को ताक पर रखकर यह रिटर्न चुकायेंगी। सरकारी खरीद-फरोक्त, पाॅलिसी मेकिंग, योजनाओं के निर्माण आदि में इन संस्थानों का प्रभावशाली हस्तक्षेप होता है। ये सबकुछ सामने होने के बावजूद हमारे नेताओं को खूब जनसमर्थन प्राप्त है। मायावती, मुलायम, जयललिता, लालू, आदि भ्रष्टाचारी नेताओं के ज्वलंत उदाहरण हैं परन्तु इनके जनसमर्थन में कोई कमी नही है। हमारे देश में चैटाला जैसे निर्भीक और बेशर्म नेता भी हैं जो चुनावी नारा लगाते हैं ‘‘जेल जायेंगे, नौकरी दिलायेंगे‘‘। लेकिन हमारे पास इस स्पष्ट भ्रष्टाचार को रोकने की कोई स्कीम नही है। 

न्यायालयों को भी भ्रष्टाचार निरोधक अंग की तरह काम करना चाहिये। सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय को नही बल्कि देश के जिला न्यायालयों को भी अपने महत्व को समझना होगा। हमें भोपाल गैस त्रासदी और जयललिता के मामले में जिला न्यायालय द्वारा की गयी कार्यवाहियों जैसे उदाहरण चाहिये। जिला न्यायालयों को सशक्त बनाये बिना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अधूरी है। जहाँ एक ओर अमेरिका की सर्वोच्च न्यायालय में सिर्फ 250 मुकदमें लम्बित हैं वहीं हमारे देश में यह संख्या 2,50,000 है। ऐसी परिस्थिति में संविधान के अनुच्छेद 32 उपखण्ड 4 का प्रयोग करके जिला न्यायालयों को भी रिट जारी करने की शक्ति प्रदान की जानी चाहिये। भ्रष्टाचार के किसी भी मुकदमें की सुनवाई का प्रथम न्यायालय जिला न्यायालय होता है और यदि वह सशक्त है तो मुकदमें के निस्तारण में न तो देर लगेगी और न ही लोगों का न्यायालय पर से विश्वास डगमगायेगा।

आजकल न्यायालयों का कामकाज भी कइ तरह के पूर्वाग्रहों का दास बनता जा रहा है। घटनाओं के मीडिया प्रचार के बल पर न्यायालय सी.बी.आई. जाँच के लिये आदेश पारित कर रहे हैं, कई सेवारत और रिटायर्ड जजों पर गम्भीर आपराधिक मामलों के आरोप लग रहे हैं, कई बड़े कारपोरेट और नेतागण निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं। न्याय पाने का सीधा ताल्लुक पैसे से हो गया है। देश में चुनिंदा ऐसे वकील हैं जिनको मुकदमा सौंप देने से आपके मुकदमा जीतने की सम्भावनायें 40 प्रतिशत तक बड़ जाती है चाहे न्याय की हार क्यों न हो रही हो। जस्टिस वी. आर. कृष्णाअय्यर ने इन सुपरस्टार वकीलों को ‘‘धनबल और राजनैतिक बल की विद्वान कालगल्र्स‘‘ कहकर बिल्कुल सही परिभाषित किया है। 

विश्व के कई देश भ्रष्टाचार के अपराधों को तीन आयामों में देखते हैं, अपराध, अपराधी और प्रोपर्टी। कई देश भ्रष्टाचार में संलिप्त व्यक्ति को जेल भेजने के बजाये उस पर कई तरह से जुर्माना अधिरोपित करके धन वसूलते हैं। यह प्रक्रिया ‘‘नोन कनविक्शन बेस्ड अप्रोच‘‘ कहलाती है। यह प्रक्रिया ज्यादातर विकसित देशों में प्रचलित है जहाँ पर छुपा कर धन रखने की सम्भावनायें कम होती हैं। परन्तु, हमारे देश के लिये यह प्रक्रिया कारगर साबित नही हो सकेगी। उदाहरण के लिये जयललिता बड़ी आसानी 66 करोड़ के बजाये 100 करोड़ चुका सकती हैं, ऐसे में भ्रष्टाचारियों को सुधारने और समाज में सन्देश पहुँचाने के लिये ऐसे लोगों को जेल भेजना बहुत आवश्यक है।

अमत्र्य सेन ने खूब कहा है कि भ्रष्टाचार के मामले में हम शोषित, अपराध में शामिल और वादी, तीनों होते हैं। हमारे देश में घूस देना तथा लेना दोनो ही अपराध हैं और तभी कुछ चिन्तकों का मानना है कि घूस देने को अपराध की श्रेणी से बाहर रखना चाहिये तभी भ्रष्टाचार की रोकथाम को और बल मिलेगा। भ्रष्टाचार का प्रभाव सीधे एक व्यक्ति पर न पड़कर समाज के एक वर्ग पर पड़ता है इसलिये यह एक ऐसा जघन्य अपराध है जिसका सामूल नाश अत्यन्त आवश्यक है।