Tuesday, February 12, 2013

राजनीति के फज़ल से



आज हमारे देश में मीडिया का स्वरूप इतना बदल गया है कि उसका प्रभाव देश की राजनीति पर पड़ने लगा है। आज मीडिया चैबीसों घण्टे हर व्यक्ति की पहुँच में है और चूंकि मीडिया पर से लोगों का विश्वास अभी तक टूटा नही है इसलिये किसी मुद्दे पर राय बनाने में यह बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। इसीलिये हर राजनीतिक दल अपनी वाहवाही के लिये नित्य नये मुद्दे इस मीडिया के सामने लाने के लिये जुगत भिड़ाया करता है। इन राजनीतिक दलों को मालूम है कि हमारा समाज वर्तमान में जीने का आदी हो चुका है और ये सभी इसी का लाभ उठा रहे हैं। अभी हाल ही में हुये गुजरात विधानसभा चुनाव में अफजल की फांसी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना था जहाँ मिली शिकस्त ने कांग्रेस को यह दांव खेलने पर मजबूर किया। हो न हो कांग्रेस ने इस कटु सत्य को समझ लिया है कि इस देश में सांप्रदायिकता इस कदर हावी हो गयी है कि या तो आप इस तरफ हैं या दूसरी तरफ। परन्तु, ऐसी राजनीति हमारे पंथनिरपेक्ष गणतन्त्र को कतई कुबूल नही है।
अफजल गुरू के पूरे मामले को अगर करीब से देखें तो उसमें गिरफ्तारी से लेकर न्यायालय की कार्यवाहियों तक की पूरी प्रक्रिया में कई पेंच मिल जाते हैं। समाज में बुद्धिजीवियों तथा समाजिक कार्यकर्ताओं का एक वर्ग भी लगातार इस मामले पर तीखी टिप्पणी करता रहा है और पुलिस के पास कई तर्कों का कोई जवाब ही नहीं है। दिनांक 13 दिसम्बर 2001 को जब संसद में भारतीय जनता पार्टी के किसी भ्रष्टाचार के मामले पर बहस चल रही थी कि तभी 5 हथियारबन्द आतंकियों ने संसद पर हमला कर दिया जिन्हें हमारे सुरक्षाकर्मियों ने मार गिराया था। अटल जी ने इस हमले की तुलना 9/11 से की। मारे गये पांचो आतंकियों की पहचान आज भी विवादास्पद है जिन्हें पाकिस्तानी माना गया था। देश के तत्कालीन गृहमंत्री आडवानी जी ने कहा था कि ये पांचों पाकिस्तानियों जैसे दिख रहे थे। कमाल की बात है कि आडवानी जी पाकिस्तानियों को केवल देखकर ही पहचानने का हुनर रखते हैं। जी. टीवी ने संसद हमले के पूरे मामले पर एक फिल्म का निर्माण किया जिसे ‘‘पुलिस के आरोपपत्र पर आधारित सत्य‘‘ के रूप में पेश किया गया। पूरे देश ने इस फिल्म को देखा और सत्य माना जबकि पुलिस की चार्जशीट (आरोपपत्र) की सत्यता की पुष्टि माननीय न्यायालय द्वारा की जानी थी। लोगों ने जब इस फिल्म के प्रसारण पर रोक के लिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय से मांग की तो न्यायालय ने इस मांग को यह कहते हुये ठुकरा दिया कि न्यायाधीश मीडिया से प्रभावित नही होते हैं। मैं भी मानता हँू कि हमारे न्यायाधीश मीडिया से प्रभावित नही होते हैं परन्तु इस फिल्म से हमारे समाज का अंतःकरण तो निःसंदेह प्रभावित हुआ होगा जिसका जिक्र माननीय न्यायालय ने अपने निर्णय में किया है-

‘‘इस घटना ने, जिसके कारण कई मौंते हुईं, पूरे राष्ट्र को हिला दिया था और समाज का सामूहिक अंतःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मृत्युदण्ड दिया जायेगा।‘‘

हमारी शासक, यू.पी.ए. या कहें कि कांगेस सरकार ने अफजल गुरू के मृत्युदण्ड की प्रक्रिया को पूरा करके अपने आंकलन से राजनैतिक तौर पर बाजी मार ली है। विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार तथा अन्य गम्भीर मुद्दों से घिरी हुई कांगे्रस जहाँ एक ओर हमें बेचारी कांगे्रस प्रतीत हो रही थी वहीं कसाब और अब अफजल की फांसी के बाद पूरा देश कांग्रेस को धन्यवाद दे रहा है। कितना अजीब़ इत्तेफाक है कि मैं शाम को न्यूज चैनलों पर बहस सुन रहा था जिसमें मुद्दा था कि महाकुंभ में बैठी धर्मसंसद ने सरकार से अयोध्या में भगवान श्री राम जी का मन्दिर बनाने के लिये आह्नवान किया। मैं सुबह तक यही सोच रहा था कि क्या हमारी संसद तथ्यों से सम्बन्धित सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन किसी मामले में कानून पारित कर भी सकती है कि नहीं, तभी अचानक टी.वी. पर न्यूज फ्लैश होती है कि आज सुबह 8 बजे अफजल गुरू को फांसी पर लटका दिया गया। यह ख़बर देखकर मुझे तो हैरानी हुई परन्तु हमारा पूरा देश उतना ही खुश हुआ होगा जितना पाकिस्तान को भारत से किसी क्रिकेट मैच में हारा हुआ देखकर खुश होता है। अफजल की फांसी की खबर मिलने के बाद हमारी फटाफट मीडिया ने अयोध्या मन्दिर के लिये कानून की मांग की खबर को किनारे किया और फांसी को कांग्रेस सरकार की एक उपलब्धि के रूप में पेश किया जाने लगा। बीजे.पी. के फील गुड वाले नारे का भले ही मजे का मजाक उड़ चुका है परन्तु हमारे राजनैतिक भाई लोगों के हिसाब से आज भी सत्य तो यही है कि जो लोगों को खुशी महसूस करा देगा, लोग उसे ही सत्ता सौंप देंगे। आतंकी कसाब और अब अफज़ल गुरू की फांसी ने कांग्रेस पार्टी के बायोडाटा में चार चांद लगा दिये हैं जो अब अगले चुनाव में बढि़या से इस्तेमाल किये जायेंगे। यह महज एक इत्तेफाक है कि आगामी लोकसभा चुनाव कुछ ही महीनों बाद हैं।
मुझे अपने देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्याय पर पूर्ण विश्वास है और मैं मानता हूँ कि अफजल की फांसी के बाद हमारे समाज का अंतःकरण अवश्य ही संतुष्ट हो चुका होगा। वैसे इसी समाज का अंतःकरण लोकपाल बिल पास कराने और रेप के दोषियों को गंभीरतम सजा़ दिलवाने, आदि सम्बन्धी कानूनों की भी काफी चाहत रखता है जिसपर सरकार को जल्द ही कोई फैसला लेना चाहिये। अफज़ल गुरू के मामले में हमारे नेताओं, पुलिस और न्यायालय ने जिस प्रकार की समझ और सूझबूझ का परिचय दिया है, मुझे लगता है कि कम से कम समाज के अंतःकरण की संतुष्टि के खातिर हर मामले में सरकार ऐसी ही तेजी दिखलायेगी। अफजल गुरू के निर्देशन में हमारी संसद के ऊपर किये हमले में हमारे 8 जवान और एक माली शहीद हुआ था जो कि देश के लिये अपूर्णनीय क्षति है। सरकार ने इतने वर्ष इन्तजार करने के बाद गुप्त रूप से यह निर्णय लिया और अपराधी को न्यायोचित सज़ा दिलवाई। कांग्रेस पार्टी के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या तथा बेअंत सिंह के मामले में अपराधिओं को काफी पहले गिरफ्तार किया जा चुका है जिनकी फांसी, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सजा़ सुनाये जाने के बावजूद आज भी लम्बित है। इन मामलों में भी सरकार और राष्ट्रपति द्वारा तेजी दिखलाये जाने की आवश्यकता है और यदि हमारी सरकार इतनी न्यायप्रिय है तो अवश्य ही इन मामलों में भी जल्द ही कार्यवाही की जायेगी।
            ‘‘राजनीति का भी अजीब़ फंडा है, जब तक चाहे लटका कर रखे और जब चाहेे लटका दे‘‘