Thursday, October 3, 2013

शीर्षक रहित


आज के राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुये मुझे लग रहा है कि अपने देश में राजनीति का एक काल समाप्त हो चुका है और अब इसका पुनर्जन्म हुआ है और तभी हमारे राजनेता हर मामले में बचकाना व्यवहार कर रहे हैं। आज के समय में हमारे पास जानकारियों की कमी नही है और हम किसी न किसी माध्यम से देश की लगभग हर गतिविधि पर नज़र रखते हैं। सतही तौर पर देखने पर (जो आज के समाज का दुर्भाग्यपूर्ण स्टाइल है) तो हमारे राजनीतिज्ञों की गतिविधियां सामान्य सी प्रतीत होती हैं पर अगर आप थोड़ी सी गम्भीरता से सोंचे तो देश के भविष्य को लेकर आपको घबराहट महसूस होगी।
इन राजनीतिज्ञों का भेड़चाल रवैया हमारी चिन्ता का विषय होना चाहिये। हमें सोचना होगा कि आज हमारे राजनेता कोई भी नीतिगत निर्णय लेने में इतना सकुचाने क्यों लगे हैं। हमें खुद से प्रश्न पूँछना होगा कि शौचालय बनाम देवालय जैसी फालतू बहसों और तरह-तरह के राजनीतिक स्टंटों में सम्पूर्ण देश का कीमती समय क्यों जाया हो रहा है। हमें इन राजनेताओं से उत्तर चाहिये कि इन्होंने व्यक्तियों को विचारधाराओं से बड़ा क्यों बना दिया है। किसी आमूलचूल परिवर्तन के बजाये कब तक हमें आंकणों के घुमावदार खेल में घूमते रहना होगा। आज के युवा हमारे नेताओं में अपने आदर्श क्यों नही खोज पा रहे हैं। हमें यह भी जानना है कि क्या कोई ‘‘अगली सरकार किसकी होगी?‘‘ से भी अधिक आवश्यक प्रश्न है हमारे देश में।
आज भी हमारे देश में प्रशासनिक सेवा करने का मौका प्राप्त करने के लिये होने वाली परीक्षा, विश्व की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक है। परन्तु, व्यवहारिकता में आज हमारे प्रशासनिक अधिकारी राज्यों और केन्द्र के राजनेताओं के हांथों की कठपुतली बनते चले जा रहे हैं। ज्यादातर अधिकारी अपने स्तर से कोई भी बड़ा निर्णय नही लेते हैं क्योंकि उनके सामने ढ़ेरों उदाहरण पेश कर दिये हैं कि आकाओं की अनुमति के बिना निर्णय लेने से इन अधिकारियों को अनेकों तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। पहले के समय में प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति के समय इस बात का पूरा ख्याल रखा जाता था कि वह अधिकारी अपने क्षेत्राधिकार के इलाकों के विभिन्न कारकों से भली भांति परिचित हो और वहाँ के लोगों से स्वस्थ सम्पर्क बना सके। ऐसे अधिकारी किसी भी अप्रिय परिस्थिति में निर्णय लेने में श्रेष्ठ होते थे और उन्हें पूरी स्वतन्त्रता भी थी। परन्तु, आज की स्थिति बहुत अज़ीब हो गयी है और प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानांतरण कुछ ‘‘विशेष मूल्यों‘‘ पर निर्धारित होने लगा है।
आज लगभग हर मामले में न्यायालय का हस्तक्षेप साफतौर पर विधानसभाओं और संसद की निर्णय लेने में अक्षमता का परिचायक है। इन पंचायतों के सदस्यों के लिये किसी भी मामले में आम राय बना पाना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है और सारा भार, न चाहते हुये भी न्यायालयों को उठाना पड़ रहा है। सर्वोच्च न्यायालय तथा विभिन्न उच्च न्यायालयों में जिस प्रकार जनहित याचिकाओं का प्रचलन बढ़ा है, वह भी इस तथ्य की तस्दीक करता है। जहाँ एक ओर हमारे न्यायालय पहले से काफी काम के बोझ तले दबे हैं वहीं हमारे राजनेताओं की अक्षमता के कारण न्यायालयों का कीमती समय जनता के उन हितों के संरक्षण में खप रहा है जिनकी संवैधानिक जिम्मेदारी राजनेताओं पर है।
हमारे देश के न्यायालयों के साथ-साथ पत्रकारिता (मीडिया) भी लोगों के हितों के संरक्षण में बहुत आवश्यक किरदार निभा रही है। आज के मीडिया का स्तर हमारी अपेक्षाओं के अनुसार तो नही है परन्तु, सूचना क्रान्ति के इस युग में मीडिया के विभिन्न अंगों के मध्य प्रतियोगितावादी रवैया होने से लगभग हर सूचना त्वरित गति से सबके सामने आ जाती है। हमारी मीडिया पर भी तरह-तरह के आरोप लग रहे हैं और कई मीडियाकर्मी अपने निजी स्वार्थों के कारण इसकी छवि को धूमिल भी कर रहे हैं। परन्तु, यह एक तथ्य है कि आज का मीडिया पहले से अधिक शक्तिशाली हुआ है और जन के मानस को जगाने में बेहद महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। इसी मीडिया के कारण अब हमारे राजनेताओं के भीतर कुछ जिम्मेदारी के भाव जागृत हो रहे हैं और अपनी छवि की ख़ातिर ही सही पर राजनेताओं के हृदय में लोगों का भय पनप रहा है।
हमारे देश का एक बहुत बड़ा तबका आज मोबाइल, इण्टरनेट, आदि के साथ-साथ सूचना क्रान्ति के अनेकों माध्यमों से जुड़ चुका है और हर तरह की सूचनायें एक दूसरे के साथ साझा कर रहा है। इन माध्यमों में सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स का बहुत बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है। आज हम लोगों के इस नये समूह को सोशल मीडिया नाम से भी जान रहे हैं। सोशल मीडिया, मीडिया का कोई पारम्परिक रूप नही बल्कि देश की सामयिक घटनाओं पर आम-जनों की अभिव्यक्ति मात्र है। मेरे मुताबिक सोशल मीडिया अपने देश के लाखों चैराहों और गलियों में बतियाते हुये लोगों के एक साझा मंच की तरह है। ये वही लोग हैं जो देश की हर घटना पर प्रतिक्रियायें रखते हैं और किसी की बात स्वीकार न होने पर उसका मुखर विरोध भी करते हैं। सूचना क्रान्ति ने इस प्रकार की हर प्रतिक्रिया और विरोधों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक और फिर सभी के बीच तेजी से फैलाने का काम किया है। सोशल मीडिया ने भी अभी हाल के समय में देश की विभिन्न घटनाओं पर अपने तरीके से सामूहिक प्रतिक्रिया व्यक्त की है जिसने हमारे राजनेताओं और कई प्रशासनिक कार्यालयों के शिथिल रवैये पर चोट की है और उन्हें त्वरित कार्यवाही करने हेतु विवश किया है। सोशल मीडिया स्वस्थ मानसिकता के लोगों के लिये वरदान की भांति है परन्तु कुछ दूषित मानसिकता के लोगों ने यहाँ पर भी अपना प्रभाव डालना प्रारम्भ कर दिया है। कई मौकों पर इन मंचों पर बहुत निम्न मानसिकता की बातचीत भी दिखाई देती हैं। इन्हीं कारणों से देश में सोशल मीडिया को लेकर भी एक व्यापक बहस का माहौल बनता दिखाई दे रहा है। परन्तु, सोशल मीडिया पर होने वाली हर बहस को यह ध्यान रखना होगा कि किसी भी रूप में हमारे देश के आमजनों से उनकी भावनाओं की जिम्मेदारीपूर्ण अभिव्यक्ति की सिर्फ तभी अपेक्षा की जा सकती है जब हमारे नीतिनियन्ता खुद उच्च नैतिक आचरण के उदाहरण प्रस्तुत कर सकें।
हम अपने देश को चलाने के लिये अपने प्रतिनिधि चुनकर संसद और विधानसभाओं में भेजते हैं ताकि हम सुकून से अपना घर चला सकें। परन्तु, इन जनप्रतिनिधियों ने देश को भगवान भरोसे छोड़ रखा है और यदि ये कोई बड़ा नीतिगत निर्णय लेने का साहस करते हैं तो सिर्फ राजनीतिक फायदों के लिये। आज हमारा मीडिया, धरनों और अनशनों की ख़बरों से भरा रहता है जो इस तथ्य का परिचायक है कि लोगों के मन में अपने प्रतिनिधियों को लेकर विश्वास धूमिल होता जा रहा है। यह सही है कि हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था कुशासन के कारण पंगु बन गई है और इसका कोई त्वरित उपचार नही है। परन्तु, हमारे प्रतिनिधियों को शासन व्यवस्था के प्रत्येक चरण के शुद्धीकरण के लिये रूपरेखा तैयार कर लेनी चाहिये और उसे हमारे सामने पेश करना चाहिये। और हमें भी यह याद रखना है कि अगले चुनावों में जब कोई प्रत्याशी हमसे वोट मांगने आये तो हमें उनसे व्यवस्था के शुद्धीकरण के विषय में उनकी सोच और चरणबद्ध रूपरेखा की मांग करनी होगी।

Tuesday, February 12, 2013

राजनीति के फज़ल से



आज हमारे देश में मीडिया का स्वरूप इतना बदल गया है कि उसका प्रभाव देश की राजनीति पर पड़ने लगा है। आज मीडिया चैबीसों घण्टे हर व्यक्ति की पहुँच में है और चूंकि मीडिया पर से लोगों का विश्वास अभी तक टूटा नही है इसलिये किसी मुद्दे पर राय बनाने में यह बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। इसीलिये हर राजनीतिक दल अपनी वाहवाही के लिये नित्य नये मुद्दे इस मीडिया के सामने लाने के लिये जुगत भिड़ाया करता है। इन राजनीतिक दलों को मालूम है कि हमारा समाज वर्तमान में जीने का आदी हो चुका है और ये सभी इसी का लाभ उठा रहे हैं। अभी हाल ही में हुये गुजरात विधानसभा चुनाव में अफजल की फांसी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना था जहाँ मिली शिकस्त ने कांग्रेस को यह दांव खेलने पर मजबूर किया। हो न हो कांग्रेस ने इस कटु सत्य को समझ लिया है कि इस देश में सांप्रदायिकता इस कदर हावी हो गयी है कि या तो आप इस तरफ हैं या दूसरी तरफ। परन्तु, ऐसी राजनीति हमारे पंथनिरपेक्ष गणतन्त्र को कतई कुबूल नही है।
अफजल गुरू के पूरे मामले को अगर करीब से देखें तो उसमें गिरफ्तारी से लेकर न्यायालय की कार्यवाहियों तक की पूरी प्रक्रिया में कई पेंच मिल जाते हैं। समाज में बुद्धिजीवियों तथा समाजिक कार्यकर्ताओं का एक वर्ग भी लगातार इस मामले पर तीखी टिप्पणी करता रहा है और पुलिस के पास कई तर्कों का कोई जवाब ही नहीं है। दिनांक 13 दिसम्बर 2001 को जब संसद में भारतीय जनता पार्टी के किसी भ्रष्टाचार के मामले पर बहस चल रही थी कि तभी 5 हथियारबन्द आतंकियों ने संसद पर हमला कर दिया जिन्हें हमारे सुरक्षाकर्मियों ने मार गिराया था। अटल जी ने इस हमले की तुलना 9/11 से की। मारे गये पांचो आतंकियों की पहचान आज भी विवादास्पद है जिन्हें पाकिस्तानी माना गया था। देश के तत्कालीन गृहमंत्री आडवानी जी ने कहा था कि ये पांचों पाकिस्तानियों जैसे दिख रहे थे। कमाल की बात है कि आडवानी जी पाकिस्तानियों को केवल देखकर ही पहचानने का हुनर रखते हैं। जी. टीवी ने संसद हमले के पूरे मामले पर एक फिल्म का निर्माण किया जिसे ‘‘पुलिस के आरोपपत्र पर आधारित सत्य‘‘ के रूप में पेश किया गया। पूरे देश ने इस फिल्म को देखा और सत्य माना जबकि पुलिस की चार्जशीट (आरोपपत्र) की सत्यता की पुष्टि माननीय न्यायालय द्वारा की जानी थी। लोगों ने जब इस फिल्म के प्रसारण पर रोक के लिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय से मांग की तो न्यायालय ने इस मांग को यह कहते हुये ठुकरा दिया कि न्यायाधीश मीडिया से प्रभावित नही होते हैं। मैं भी मानता हँू कि हमारे न्यायाधीश मीडिया से प्रभावित नही होते हैं परन्तु इस फिल्म से हमारे समाज का अंतःकरण तो निःसंदेह प्रभावित हुआ होगा जिसका जिक्र माननीय न्यायालय ने अपने निर्णय में किया है-

‘‘इस घटना ने, जिसके कारण कई मौंते हुईं, पूरे राष्ट्र को हिला दिया था और समाज का सामूहिक अंतःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मृत्युदण्ड दिया जायेगा।‘‘

हमारी शासक, यू.पी.ए. या कहें कि कांगेस सरकार ने अफजल गुरू के मृत्युदण्ड की प्रक्रिया को पूरा करके अपने आंकलन से राजनैतिक तौर पर बाजी मार ली है। विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार तथा अन्य गम्भीर मुद्दों से घिरी हुई कांगे्रस जहाँ एक ओर हमें बेचारी कांगे्रस प्रतीत हो रही थी वहीं कसाब और अब अफजल की फांसी के बाद पूरा देश कांग्रेस को धन्यवाद दे रहा है। कितना अजीब़ इत्तेफाक है कि मैं शाम को न्यूज चैनलों पर बहस सुन रहा था जिसमें मुद्दा था कि महाकुंभ में बैठी धर्मसंसद ने सरकार से अयोध्या में भगवान श्री राम जी का मन्दिर बनाने के लिये आह्नवान किया। मैं सुबह तक यही सोच रहा था कि क्या हमारी संसद तथ्यों से सम्बन्धित सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन किसी मामले में कानून पारित कर भी सकती है कि नहीं, तभी अचानक टी.वी. पर न्यूज फ्लैश होती है कि आज सुबह 8 बजे अफजल गुरू को फांसी पर लटका दिया गया। यह ख़बर देखकर मुझे तो हैरानी हुई परन्तु हमारा पूरा देश उतना ही खुश हुआ होगा जितना पाकिस्तान को भारत से किसी क्रिकेट मैच में हारा हुआ देखकर खुश होता है। अफजल की फांसी की खबर मिलने के बाद हमारी फटाफट मीडिया ने अयोध्या मन्दिर के लिये कानून की मांग की खबर को किनारे किया और फांसी को कांग्रेस सरकार की एक उपलब्धि के रूप में पेश किया जाने लगा। बीजे.पी. के फील गुड वाले नारे का भले ही मजे का मजाक उड़ चुका है परन्तु हमारे राजनैतिक भाई लोगों के हिसाब से आज भी सत्य तो यही है कि जो लोगों को खुशी महसूस करा देगा, लोग उसे ही सत्ता सौंप देंगे। आतंकी कसाब और अब अफज़ल गुरू की फांसी ने कांग्रेस पार्टी के बायोडाटा में चार चांद लगा दिये हैं जो अब अगले चुनाव में बढि़या से इस्तेमाल किये जायेंगे। यह महज एक इत्तेफाक है कि आगामी लोकसभा चुनाव कुछ ही महीनों बाद हैं।
मुझे अपने देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्याय पर पूर्ण विश्वास है और मैं मानता हूँ कि अफजल की फांसी के बाद हमारे समाज का अंतःकरण अवश्य ही संतुष्ट हो चुका होगा। वैसे इसी समाज का अंतःकरण लोकपाल बिल पास कराने और रेप के दोषियों को गंभीरतम सजा़ दिलवाने, आदि सम्बन्धी कानूनों की भी काफी चाहत रखता है जिसपर सरकार को जल्द ही कोई फैसला लेना चाहिये। अफज़ल गुरू के मामले में हमारे नेताओं, पुलिस और न्यायालय ने जिस प्रकार की समझ और सूझबूझ का परिचय दिया है, मुझे लगता है कि कम से कम समाज के अंतःकरण की संतुष्टि के खातिर हर मामले में सरकार ऐसी ही तेजी दिखलायेगी। अफजल गुरू के निर्देशन में हमारी संसद के ऊपर किये हमले में हमारे 8 जवान और एक माली शहीद हुआ था जो कि देश के लिये अपूर्णनीय क्षति है। सरकार ने इतने वर्ष इन्तजार करने के बाद गुप्त रूप से यह निर्णय लिया और अपराधी को न्यायोचित सज़ा दिलवाई। कांग्रेस पार्टी के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या तथा बेअंत सिंह के मामले में अपराधिओं को काफी पहले गिरफ्तार किया जा चुका है जिनकी फांसी, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सजा़ सुनाये जाने के बावजूद आज भी लम्बित है। इन मामलों में भी सरकार और राष्ट्रपति द्वारा तेजी दिखलाये जाने की आवश्यकता है और यदि हमारी सरकार इतनी न्यायप्रिय है तो अवश्य ही इन मामलों में भी जल्द ही कार्यवाही की जायेगी।
            ‘‘राजनीति का भी अजीब़ फंडा है, जब तक चाहे लटका कर रखे और जब चाहेे लटका दे‘‘